
राजस्थान हाईकोर्ट की, 29 अगस्त 1949 की सुबह करीब 10.30 बजे का वक्त था, तत्कालीन राजप्रमुख महाराजा सवाई मानसिंह ने जयपुर में हाईकोर्ट का शुभारम्भ किया। उसी दिन जोधपुर में न्यायाधीश कमलकांत वर्मा को मुख्य न्यायाधीश व 11 अन्य को न्यायाधीश पद की शपथ दिलाने के साथ राजस्थान हाईकोर्ट विधिवत रूप से अस्तित्व में आया, लेकिन यह दिन आज किसी को याद नहीं है। जब हाईकोर्ट की स्थापना हुई उस समय न मुकदमे पर तारीख पड़ती थी और न फैसले के दिन-महीनों का इंतजार करना पड़ता था। पेश होने के दिन ही मुकदमों की सुनवाई हो जाती थी। इसके विपरीत हाईकोर्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार अब मुकदमों के फैसले में कम से कम दो साल और अधिकतम पौने ग्यारह साल तक का समय लग रहा है। उस समय हाईकोर्ट में रजिस्ट्रार जनरल जैसा कोई पद नहीं था, तो बीकानेर के तत्कालीन जिला न्यायाधीश जफरउल्लाह खान को विशेषाधिकारी के रूप में यह जिम्मेदारी सौंपी गई। उस समय जयपुर और जोधपुर के साथ ही कोटा और बीकानेर में भी हाईकोर्ट की बेंच थी। उदयपुर संभाग के मुकदमों की सुनवाई उदयपुर में होती थी। राजस्थान हाईकोर्ट के पहले मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ लेने से पहले कमल कांत वर्मा उदयपुर हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे थे। शुरुआत में जोधपुर से अमर सिंह जसोल एक मात्र ऐसे न्यायाधीश थे, जिनके पास विधि स्नातक की डिग्री तक नहीं थी। संविधान लागू होने पर 26 जनवरी 1950 को हाईकोर्ट न्यायाधीशों को पुन: शपथ दिलाई गई।