
World Sparrow Day 2023: लगातार घट रही गौरैया, इन्हें बचाना है बेहद जरूरी
जयपुर।आज गौरेया दिवस है। कभी घर आंगन में चिडियों की चहचहाट आम बात थी। घर के लोग चुग्गा डालकर गौरेया को सरंक्षित किया करते थे। चीं.चीं, चिरैया, चिडिय़ा जैसे कई नामों ने जानी जाने वाली गौरेया अब कम ही नजर आती है। बदलती लाइफस्टाइल, बढ़ता शहरीकरण, खेतों में पेस्टीसाइड के बढ़ते प्रयोग ने गौरेया की संख्या में कमी की है। गौरैया के प्रति लोगों को जागरुक करने के लिए पूरे विश्व में हर वर्ष 20 मार्च को गौरैया दिवस मनाया है। इस दिवस को पहली बार वर्ष 2010 में मनाया गया था। लगातार घट रही गौरैया की संख्या को अगर गंभीरता से नहीं लिया गया तो वह दिन दूर नहीं, जब गौरैया हमेशा के लिए दूर चली जाएगी।
इसलिए कम हो रही गौरेया
शहरीकरण के कारण वृक्षों की अंधाधुंध कटाई,अत्याधुनिक मकानों के साथ खेतों में पेस्टीसाइड के प्रयोग से गौरेया की संख्या कम हो रही है। घौंसला बनाने के लिए कोई स्थान न होने के कारण इनका बसेरा उजड़ सा गया है और इस कारण इनकी संख्या में तेजी से गिरावट आ रही है, जिसके चलते गौरेया की कई प्रजातियां लुप्त प्राय: हो चुकी हैं।
यह है गौरेया की स्थितिदुनिया में पक्षियों की लगभग 9,900 प्रजातियां ज्ञात हैं और उनमें से 189 प्रजातियां विलुप्त हो चुकी है और कुछ विलुप्त होने के कगार पर है। भारत में 1,250 प्रजातियां पाई जाती है, जिनमें 85 प्रजातियां विलुप्त के कगार पर हैं अगर गौरेया की बात करें तो विश्व भर में गौरैया की 26 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से 5 भारत में देखने को मिलती हैं। गौरैया ज्यादातर छोटे.छोटे झाड़ीनुमा पेड़ों में रहती हैं लेकिन अब वो बचे ही नहीं हैं।
प्रकृति और पक्षी प्रेम का अनूठा उदाहरण
राजधानी जयपुर के मालवीय नगर इलाके में रहने वाले नवल डागा पर्यावरण संरक्षण का पर्याय हैं। 13 जुलाई 1977 से पेड़, पानी और वन्यजीव संरक्षण के लिए काम कर रहे डागा इनका घर प्रकृति और पक्षी प्रेम का अनूठा उदाहरण है। पूरा घर गिलोय और जीवंती की बेलों से ढक रखा है। गर्मियों में जब बाहर का तापमान 45 डिग्री होता है, तो उनके घर के अंदर 36 डिग्री। इतना ही नहीं घर के अंदर बाहर हर तरफ गौरेया के लिए हाथ से बने घौंसले और परिंडे लगाए गए हैं, जिसमें सुबह से ही इनका चहचहाना शुरू हो जाता है।उनके यहां तैयार होने वाले लकड़ी वाले प्रॉडक्ट्स के लिए वह कभी पेड़ नहीं काटने देते। कबाड़ के लकड़ी, कांच, प्लास्टिक, कागज, गत्ता, फ्लेक्स, विनाइल आदि से काम चला लेते हैं। इनके यहां बनने वाले लकड़ी के आइटम्स में कहीं भी कोई कील प्रयोग नहीं की जाती। आईएएस और आईएफएस की तैयारी करने वाले युवा और कोचिंग देने वाले उनके यहां टीचर्स उनके यहां आते हैं। नवल और शारदा डागा का कहना है कि आप भले ही दो साल तक पौधे नहीं लगाओ लेकिन जो पहले से लगे हैं उन्हें भी बचा लिया तो पर्यावरण संरक्षण के साथ गौरेया का संरक्षण अपने आप ही हो जाएगा।
कृत्रिम घौंसले लगाकर गौरेया को बचाने की कवायद
राजस्थान एनिमल वेलफेयर बोर्ड और वल्र्ड संगठन के निदेशक मनीष सक्सेना गौरेया को बचाने की कवायद में लगे हैं। उनकी संस्था कृत्रिम घौंसले और परिंडे लगाकर इनके सरंक्षण के लिए पिछले कई सालों से प्रयासरत हैं। मनीष सक्सेना का कहना है कि जैव विविधता संतुलन में पक्षियों की महत्वपूर्ण भूमिका है। शहरी क्षेत्रों में गौरैया की गिरती संख्या से संतुलन तेजी से बिगड़ रहा है, इसे ध्यान में रखते हुए वल्र्ड संगठन गौरैया के लिए पक्षी संरक्षण अभियान चला रहा है, जिसके तहत स्काउट गाइड, नेशनल कैडट कोर तथा विद्यार्थियों के सहयोग से गौरैया के लिए कृत्रिम घौंसले एवं परिंडे लगाए जा रहे हैं। उनका कहना है कि कृत्रिम घौंसले लगाकर इनके रहने तथा खाने के लिए दाना व पानी की व्यवस्था कर पुन: शहरी क्षेत्रों में बसाने की कवायद की जा रही है। अगर आपके घर में कनेर, शहतूत जैसे झाड़ीनुमा पेड़ हैं तो उन्हें न काटे और गर्मियों में पानी को रखें।
Published on:
20 Mar 2023 09:48 am
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