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144 साल बाद निकली दादागुरुदेव की पवित्र चादर, स्वर्णनगरी में निकला वरघोड़ा

स्वर्णनगरी में आयोजित तीन दिवसीय दादागुरुदेव चादर महोत्सव के तहत शनिवार को आस्था, श्रद्धा और भक्ति से ओतप्रोत ऐतिहासिक वरघोड़ा निकला।

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स्वर्णनगरी में आयोजित तीन दिवसीय दादागुरुदेव चादर महोत्सव के तहत शनिवार को आस्था, श्रद्धा और भक्ति से ओतप्रोत ऐतिहासिक वरघोड़ा निकला। लगभग 144 वर्ष बाद सोनार दुर्ग स्थित पार्श्वनाथ जैन मंदिर के ज्ञान भंडार से दादागुरुदेव जिनदत्तसूरीजी महाराज की 871 वर्ष से अधिक प्राचीन पवित्र चादर को विधिवत पूजन-अर्चना के बाद बाहर लाया गया। जैन समाज में इस चादर का अत्यंत धार्मिक महत्व है और इसे गहन आस्था का प्रतीक माना जाता है।

दादागुरुदेव जिनदत्तसूरि चादर समिति के तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में गच्छाधिपति आचार्य जिनमणिप्रभ सूरि, आचार्य मनोज्ञ सागर सूरि, वसन्त विजय, केंद्रीय मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत, पोकरण विधायक महंत प्रतापपुरी, जैसलमेर विधायक छोटूसिंह भाटी और शिव विधायक रविन्द्रसिंह भाटी सहित अनेक जनप्रतिनिधि तथा संत-मुनि मौजूद रहे। गच्छाधिपति आचार्य जिनप्रभमणि सूरीश्वर ने कहा कि अमरसागर जैन मंदिर की स्थापना के समय चादर की पेटी नहीं खोली गई थी और इसे प्रतिष्ठा स्थल पर ही विराजित किया गया था। लगभग डेढ़ सौ वर्ष पहले वृद्धिचंद्र महाराज पाटन से यह पवित्र चादर जैसलमेर लाए थे। इतने वर्षों तक इस धरोहर को सुरक्षित रखने के लिए जैन ट्रस्ट और समाज के प्रवासी परिवारों का योगदान सराहनीय रहा। उन्होंने कहा कि जैसलमेर ऐसा स्थान है जहां देश ही नहीं, विश्व के विभिन्न हिस्सों से लोग आते हैं और यहां 36 कौमों का संगम देखने को मिलता है। इसलिए जैन धर्म के इतिहास और विरासत को संरक्षित करने के लिए यहां एक विशेष संग्रहालय की स्थापना होनी चाहिए।

वरघोड़े में झांकियां और लोककलाकार आकर्षण

चादर महोत्सव के राष्ट्रीय सचिव पदम टाटिया के अनुसार पवित्र चादर को सोनार दुर्ग से गड़ीसर सर्किल तक लाया गया, जहां विशेष रूप से तैयार रथ में विराजित किया गया। इसके बाद वरघोड़ा शुरू हुआ। शोभायात्रा में हजारों श्रद्धालु, जैन संत-मुनि और साध्वियां शामिल हुईं। वरघोड़े में 21 सजे-धजे घोड़े, 21 ऊंट, 2 हाथी, 20 नासिक ढोल दल, कच्ची घोड़ी नृत्य दल और विभिन्न राज्यों से आए लोक कलाकार शामिल रहे। ड्रोन से पुष्पवर्षा ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया। गड़ीसर सर्किल से निकला वरघोड़ा नगर परिषद, एयरफोर्स सर्किल, नीरज सर्किल, हनुमान सर्किल और गीता आश्रम मार्ग से होते हुए डेडानसर मेला मैदान पहुंचा। रास्ते भर लोगों ने पुष्पवर्षा कर चादर और साधु-साध्वियों का स्वागत किया।

महोत्सव स्थल पर अभिषेक

महोत्सव स्थल पर पवित्र चादर को कांच के विशेष पात्र में विराजित किया गया। मंत्रोच्चारण और दीप प्रज्वलन के साथ गंगोत्री और मानसरोवर से लाए गए जल से अभिषेक किया गया। इस अवसर पर चादर को पानी के जहाज के आकार में सजे विशेष रथ में लाया गया था। चादर के लाभार्थी तमिलनाडु निवासी गौतमचंद पुत्र पन्नालाल कवाड़ रहे, जबकि पहला अभिषेक करने का सौभाग्य फलौदी निवासी रविंद्र कुमार बंसावट को मिला।

1 करोड़ 8 लाख इकतीसा पाठ का संकल्प

महोत्सव के दौरान विश्वभर के जैन श्रद्धालुओं ने एक करोड़ आठ लाख दादागुरु इकतीसा पाठ का संकल्प लिया। गच्छाधिपति आचार्य जिनमणिप्रभ सूरि ने घोषणा की कि प्रतिवर्ष सात मार्च को विश्वभर में दादागुरु भक्त इकतीसा पाठ करेंगे। केंद्रीय मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने कहा कि 150 वर्ष बाद पवित्र चादर के दर्शन होना सौभाग्य की बात है। इस चादर को जैसलमेर को महामारी से बचाने वाली आस्था का प्रतीक माना जाता है। महाराष्ट्र सरकार में मंत्री मंगल प्रभात लोढ़ा ने कहा कि दादागुरु के प्रति श्रद्धा का यह दृश्य अत्यंत भावुक करने वाला है। ऐतिहासिक चादर महोत्सव में देश-विदेश से आए हजारों श्रद्धालु शामिल हुए। पूरे शहर में भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्भुत वातावरण देखने को मिला। आयोजन को लेकर प्रशासन और समिति ने सुरक्षा और व्यवस्थाओं के व्यापक इंतजाम किए।