
सरहदी रेगिस्तान की गोद में बसी पोकरण फील्ड फायरिंग रेंज देश की रक्षा क्षमता की सबसे बड़ी प्रयोगशाला बन चुकी है। जहां एक ओर तपती धरती और जमा देने वाली हवाएं मौसम की चुनौती पेश करती हैं, वहीं दूसरी ओर मिसाइलों की गूंज और टैंकों की गरज हर क्षण दुश्मन को चेतावनी देती है। यही वो रणभूमि है जहां भारत ने दुनिया को अपनी परमाणु शक्ति का अहसास कराया और अब हर आधुनिक अस्त्र-शस्त्र की पहली परख यहीं होती है।
मई-जून की 50 डिग्री सेल्सियस गर्मी हो या चांधन के इलाके में गिरता शून्य से नीचे तापमान - पोकरण की यह विषम जलवायु हथियारों की परख के लिए आदर्श बन गई है। यहां बारह महीने युद्धाभ्यास चलते हैं। डीआरडीओ और भारतीय सेनाएं यहां निरंतर मिसाइल, टैंक, तोप और लड़ाकू विमानों के परीक्षण करती हैं।
वर्ष 1998 में सिलसिलेवार परमाणु परीक्षणों से विश्व मानचित्र पर उभरी पोकरण रेंज अब तक ब्रह्मोस, नाग, धनुष, आकाश, पिनाक, स्मर्च, अर्जुन टैंक और एम777 हॉविट्जर जैसे अत्याधुनिक हथियारों की अग्निपरीक्षा का गवाह बन चुकी है। फ्रंट लाइन एयरक्राफ्ट के वायुरक्षा अभ्यास से लेकर रेगिस्तानी युद्धनीति के भौगोलिक अभ्यास तक, यह रेंज भारत की हर रणनीति की नींव है।
पोकरण फील्ड फायरिंग रेंज को चार भागों- ए, बी, सी व डी में विभाजित किया गया है। खेतोलाई, धोलिया और लाठी के पास थलसेना तो चांधन क्षेत्र में वायुसेना अभ्यास करती है। यहां नई बंदूकें, तोपें, गोलाबारूद व मिसाइलें मौसम की विविधताओं में कसौटी पर कसी जाती हैं।
पाकिस्तान सीमा के पास होने के कारण यह क्षेत्र न केवल सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि भारत के आत्मनिर्भर रक्षा विकास में भी इसकी भूमिका अत्यंत अहम है। आधुनिक हथियारों की परख के साथ सैन्य अभ्यासों का यह रेगिस्तानी रणक्षेत्र, देश की ताकत, तकनीक और तजुर्बे की त्रिवेणी बन चुका है।
Updated on:
14 May 2025 07:59 pm
Published on:
14 May 2025 11:53 pm
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