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पालीवाल 731 साल से नहीं मनाते है राखी पर्व: ऋषिदत्त पालीवाल

पालीवाल 731 साल से नहीं मनाते है राखी पर्व-ऋषिदत्त पालीवाल, इतिहासवेत्ता

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पालीवाल 731 साल से नहीं मनाते है राखी पर्व: ऋषिदत्त पालीवाल

पालीवाल 731 साल से नहीं मनाते है राखी पर्व: ऋषिदत्त पालीवाल

जैसलमेर. पालीवाल सब प्रणधारयो,गउ रगत री आण राखी पूनम रोप गधोतर, पाली त्यागण परमाण.. आज से करीब 198 साल पहले जैसलमेर से एक ही रात में एकसाथ 84 गांव से पलायन करने वाले स्वाभिमानी व दढ़ संकल्प के धनी पालीवाल ब्राह्मण करीब 731 साल पहले पाली छोडक़र जैसलमेर की तरफ आकर बसे थे। बताया जाता है कि 1291 ई. श्रावणी शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा विक्रम संवत 1348 में रक्षा बंधन के दिन ही इन लोगों ने पाली भी एक ही रात में खाली कर वहां एक गधोतर यानि शिलालेख इस संकल्प के साथ लिखकर गए कि पाली का पानी हमारे लिए गो रक्त के समान है और पाली का भी एक ही रात में सदा के लिए त्याग दिया। एक मार्मिक घटना के अनुसार राजस्थान के पाली मारवाड में ये ब्राह्मण 6वीं सदी से रह रहे थे। जहां करीब एक लाख के लगभग आबादी थी, जो सभी समद्व व सम्पन्न थे। परपंरा के अनुसार प्रत्येक आगंतुक ब्राह्मण को एक ईंट व एक रुपए का सहयोग करते थे। पाली के आसपास रहने वाले आदिवासी लुटेरे उनसे लूटपाट करते थे। समाज के मुखिया ने राठौड़ वंश के राजा सीहा को पाली का शासक बनाया जिसने इनकी रक्षा का दायित्व लेकर अपना शासन स्थापित किया। तत्कालीन आक्रांता जलालुदीन खिलजी जो फिरोजशाह द्वितीय के नाम से दिल्ली का शासक बना। मारवाड़ में मंडोर व ईडर पर आक्रमण के दौरान पाली की समृद्धि को देखकर विक्रम संवत 1348 ई. वर्ष 1291-92 के लगभग पाली को लूटने के लिए पाली नगर के परकोटे को चारों ओर से घेरकर आक्रमण कर अत्याचार किए, लूटपाट कर पानी के एकमात्र तालाब में गोवंश का वध कर डाल दिया। ऐसे में पानी अपवित्र हो जाने से धर्म व जातीय स्वाभिमान के लिए पाली के इन हजारों ब्राह्मणों ने भी अपने आपको युद्व में झोंक दिया। शासक सीहा राठोड़ व उसके पुत्र आस्थान भी रक्षा करते हुए शहीद हो गये। रक्षा बंधन श्रावणी पूर्णिमा के दिन ही युद्व करते हुए हजारों ब्राह्मण भी शहीद हुए। पूरी पाली रक्त रंजित हो गई। किवंदती अनुसार इस युद्ध में शहीद हुए ब्राह्मणों की करीब 9 मन जनेउ व विधवा महिलाओं के हाथी दांत का करीब 84 मन चूड़ा उतरा, जिसको अपवित्र होने से बचाने के लिए उसे बाव व कुंए में डालकर बंद कर दिया गया। आज भी धोले चोतरे के नाम से विख्यात होकर संपूर्ण भारत से पालीवाल हर वर्ष यहां आते हैं। पाली के यह आदि गौड़ ब्राह्मण ही पाली पलायन के पश्चात पालीवाल ब्राह्मण कहलाए।