-जल स्तर घटा, लेकिन बिना रुके चल रहे नलकूप-साठ के दशक मे खोदे गए थे नलकूप-विशेषज्ञों को भरोसा. सदियों की पेयजल समस्या अब थमेगी
जैसलमेर. पश्चिमी राजस्थान मे जल क्रांति लाने वाले व थार के घड़े के नाम से मशहूर चांधन नलकूप की महत्ता बनी हुई है। नलकूप आज भी चल रहा है, हालांकि समय के साथ इसके जल स्तर ओर पानी की आवक मे कमी आई है, लेकिन यह नलकूप आज भी बिना रुके चल रहा है। साठ के दशक मे खुदे इस नलकूप के बाद थार मे पेयजल की समस्या का समाधान होना प्रारम्भ हुआ थाा। इस ऐतिहासिक नलकूप की सफलता की गूंज राजस्थान की विधानसभा में भी सुनाई दी थी। नलकूप की अथाह जल देय क्षमता, मीठा स्वाद और अनुपम खोज को देख़ तत्कालीन मुख्यमंत्री ने राजस्थान विधानसभा मे घोषणा की थी की थार के घड़े की खोज हो गई है। विशेषज्ञों को भी भरोसा है कि अब अब सदियों से पेयजल की समस्या झेल रहे मरुप्रदेश की प्यास बुझ सकेगी। संयुक्त राष्ट्र संघ विकास कार्यक्रम के सहयोग से खोदा गया यह नलकूप आज भी चांधन के पशु अनुसंधान केंद्र के परिसर मे चल रहा है। बारह इच घेरे के इस नलकूप से अभी भी पशुओ के लिए चारा पैदा किया जा रहा है। नलकूप के बनने के बाद चांदन एरिया की पेयजल समस्या का स्थायी समाधान हो गया था, इसी नलकूप के सहारे यहां थारपारकर नस्ल का सरंक्षण भी शुरू हुआ था। इसी नलकूप के पानी से यहां पर वन विभाग की नर्सरी भी शुरू हुई जो पुरे जिले मे वन विकास का जरिया बनी।
बीत गए वे दिन
यहां के बुजुर्ग सरहदी जिले में वे दिन नहीं भूले हैं, जब भौतिक सुख तो दूर कभी कभी लम्बे समय तक खाने-पीने के लिए भी दु:ख भोगने पड़ते थे। अकाल के स्थायी निवास समझे जाने वाले सरहदी जिले को इसी कारण काले पानी की जगह के नाम से निराशाजनक पहचान बनी।अब रेगिस्तानी जिले की फिजां बदल गई है। नलकूप आधारित कृषि के कारण यह सुखद स्थिति बनी है। दूर-दूर तक रेत के धोरों वाले मरु प्रदेश का तो पर्यावरणीय परिदृश्य ही बदल गया है। ऐसे में यहां के बाशिंदों की आर्थिक दशा ही भी बदलाव देखा जा सकता है।
अर्थव्यवस्था को गति
-इसी नलकूप से उतर भारत के श्रेष्ठ लाठी एक्वी फर की भी खोज हुई थी।
-लाठी के भू-जल स्रोत आज नलकूप आधारित क़ृषि के कारण जिले की अर्थव्यवस्था का प्रमुख भाग बन गए है।
-नलकूप से निकला जल आज सोना उगल रहा है, लेकिन अविवेकपूर्ण दोहन से चिंता भी बढ़ गई है। -जिले की सभी पंचायत समितियों डार्क जोन मे शुमार हो गई है।
-भू-जल आंकलन रिपोर्ट 2020 के अनुसार जिले का कुल भूजल दोहन 400 प्रतिशत तक बढ़ गया है।
एक्सपर्ट व्यू: तब और अब
भू जल की गुणवता मे भी गिरावट दर्ज हो गई है। पानी पीने मे तो मीठा लग रहा है, लेकिन फ्लोराइड की मात्रा बढ़ गई है। समय रहते अब भी नहीं चेते तो थार का यह घड़ा रीत कर किदवंति बन जाएगा।जरूरत इस बात की है कि दोहन को समय रहते कम करें। फसलें ऐसी हो की पानी का कम उपयोग हो। जल के अपव्यय को रोका जाएं और बारिश के पानी का उपयोग अधिकतम हो। जिले की अर्थव्यवस्था में असली बदलाव जिले में पानी की खोज के बाद शुरू हुआ। इन्दिरा गाधी नहर के आगमन से जहां नहरी क्ष् ोत्र की दशा बदली, वही भू-जल की खोज ने जिले के बारानी क्षेत्र मे बदलाव लाना शुरू कर दिया। अस्सी के दशक में तत्कालीन प्रशासन ने अकाल के स्थाई सामाधान के लिए भू-जल आधारित कृषि में लिए लोगो को प्रोत्साहित करना शुरू किया। कुए खुदवाने के लिए ग्रामीणों को प्रोत्साहित किया गया। शुरूआत चांधन, राजमथाई व ओला क्षेत्र से हुई। सुनसान व रेत के धोरे से आच्छाादित रहने वाली इस मरुधरा मे हर कहीं हरियाली नजर आने लगी। बाजरे व ग्वार की फसल को तरसने वाले खेत जीरा, सरसों व मूंगफली जैसी फसलों से हरे-भरे होने लग गए। नगदी फसलों का उत्पादन बढ़ा है। -डॉ. एनडी इणखिया, प्रभारी भू-जल वैज्ञानिक, जैसलमेर