
जैसलमेर को जिन पीत पाषाणों ने स्वर्णनगरी की उपमा दिलाई, वे आज वक्त की मार के साथ प्रदूषण के कारण तेजी से अपनी आभा खो रहे हैं। अंधाधुंध वाहनों की आवाजाही से सोनार दुर्ग से लेकर पटवा और अन्य हवेलियों पर कार्बन की कालिमा छा रही है। विशेषकर इन इमारतों का निचला हिस्सा वाहनों के प्रदूषण की चपेट में आकर अपनी स्वर्णिम आभा खो रहा है। गत कुछ वर्षों से सोनार दुर्ग और अन्य ऐतिहासिक विरासतों के साथ नव निर्माणों पर भी वाहनों के साइलेंसर से निकलने वाले धुएं की मार के चिन्ह साफ दिखाई देने लगे हैं। वाहनों के प्रदूषण के ये निशान दुर्ग तक जाने वाले चार प्रोलों से होकर जाने वाले घाटीदार मार्ग की प्राचीरों पर साफ नजर आ जाता है। यह और बात है कि जिम्मेदारों ने इस लिहाज से आज तक दुर्ग व अन्य विरासतों की संभाल करने की जरूरत को महसूस नहीं किया है।
जैसलमेर में विगत दो दशक के दौरान हर तरह के वाहनों की संख्या में गजब की तेजी आई है। जिले में सवा लाख से ज्यादा वाहन पंजीकृत हैं। इनमें शहरी क्षेत्र में चलने वाली डीजल चालितटैक्सियों की संख्या ही हजारों में पहुंच चुकी हैं। इन तिपहिया वाहनों में करीब 60 प्रतिशत की दशा शोचनीय है। वे तय मात्रा से कहीं अधिक धुआं उगल रही हैं। इन टैक्सियों की निर्बाध आवाजाही वर्ष पर्यंत सोनार दुर्ग से लेकर अन्य स्थानों तक रहती है। वे अपने पीछे धुएं के गुबार छोड़ती हुई गुजरती साफ दिखती हैं, लेकिन आज तक तिपहिया टैक्सियों की फिटनेस की जांच नहीं की गई है। ऐसे में उनकी रोकथाम और उनके संचालकों के खिलाफ कार्रवाई करने की तो बात ही करना व्यर्थ है। पर्यटन सीजन के समय सैकड़ों की तादाद में टैक्सियां रोजाना दुर्ग की चढ़ाई करती हैं और नीचे उतरती हैं। उनमें से कम से कम 50-60 प्रतिशत वाहनों से तो बहुत बड़ी मात्रा में धुआं निकलता है जो हर किसी को नजर भी आता है। शेष टैक्सियों व अन्य वाहनों से भी निकलता धुआं चाहे आसानी से नजर नहीं आए लेकिन वह किले की दीवारों की सुनहरी आभा को मद्धम करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे।
आबादी के लिहाज से राजस्थान का सबसे छोटा जिला मुख्यालय जैसलमेर गिना जाता है, लेकिन यहां वर्ष पर्यंत लाखों सैलानियों की आमद होती है। उन्हें सेवा प्रदान करने के लिए हजारों की तादाद में वाहनों की मौजूदगी है। इन वाहनों की फिटनेस की समय-समय पर जांच करवाने की दिशा में न तो परिवहन विभाग ध्यान देता है और न ही कोई अन्य जिम्मेदार महकमा। लोग भी ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण के प्रति कम ही जागरुक नजर आते हैं। हनुमान चौराहा से लेकर शहर के अन्य व्यस्त मार्गों तक से ओवरलोड वाहन गुजरते नजर आते हैं। यात्रीभार ज्यादा होने से वाहन प्रदूषण भी अधिक फैलाते हैं। सडक़ सुरक्षा सप्ताह या माह मनाए जाने के दौरान भी इस तथ्य की ओर कम ही ध्यान दिया जाता है।
ऐतिहासिक सोनार दुर्ग की पीत पत्थरों से निर्मित दीवारें पिछले दो दशकों के दौरान लगातार काली पड़ रही हैं। ऐसा किसी एक-दो जगहों पर नहीं बल्कि समूचे रास्ते भर में गौर करने पर दिखाई देता है।
जैसलमेर शहर में वाहनों से निकलने वाले धुएं की मात्रा बहुत अधिक है। इसी वजह से हाल में नगरपरिषद की ओर से लगवाए गए पत्थर के डिवाइडर भी अभी से काले पड़ रहे हैं। समय रहते कार्रवाई की दरकार है।
Published on:
04 Jun 2025 11:20 pm
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