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प्रतियोगिता के निर्णयों पर गहराते रहे हैं विवाद, व्यवस्थाएं भी करती हैं मायूस
जैसलमेर . मरु महोत्सव को रोचक व नवाचारों से युक्त बनाने को लेकर विगत कुछ वर्षों से राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय कलाकारों को बुलाया जा रहा हैं, लेकिन निराशाजनक बात यह है कि कला व संस्कृति का दर्पण माने जाने वाले इस तीन दिवसीय महोत्सव में उन कलाकारों को मौका कम दिया जा रहा है, जिन्होंने अपने हुनर का लोहा देश-दुनिया में मनवाया है। जानकारों की मानें तो बाहर से बुलाए जाने वाले मेहमान कलाकारों को भुगतान में संबंधित जिम्मेदार दरियादिली दिखाते हैं, लेकिन रेगिस्तान की मिट्टी से निकले कई कलाकार तीन दिन तक चलने वाले महोत्सव में ‘लापता’ हो जाते हैं। जिन कलाकारों से कला के हुनर सीखने के लिए सात समंदर पार से मेहमान आते हैं, उन्हें अपनी भी मातृभूमि पर होने वाले ख्यातनाम महोत्सव में अवसर नहीं दिया जाता। उधर, मरु महोत्सव का पहला दिन पूर्व में कई बार प्रतियोगिता में दिए गए निर्णयों के कारण विवादों में आ चुके हैं। हकीकत यह है कि निर्णायक कौन बनेंगे, इसको लेकर कोई पुख्ता व्यवस्था आज तक विकसित नहीं हो सकी है। विवादों के साए में रहने से आयोजन स्थल में उत्सव के दौरान विरोध के स्वर मुखर होने लगते हैं। जानकारों की मानें तो प्रतियोगिता के मापदंडों की समूची जानकारी कई बार निर्णायकों को नहीं होने से कुछ निर्णय विवाद की वजह बन जाते हैं।
वर्ष 2001 में नहीं हुआ था आयोजन
विश्व पर्यटन मानचित्र पर विशिष्ट पहचान बनाने वाले मरु महोत्सव की कामयाब भूमिका मानी जाती है। सबसे पहले वर्ष 1979 में यह मेला आयोजित हुआ था। पहला डेजर्ट फेस्टिवल चार दिन का था। बाद में इसकी अवधि घटाकर तीन दिन कर दी गई। वर्ष 2001 में गुजरात में भूकम्प त्रासदी के दौरान देश भर में शोक की घड़ी में मरु महोत्सव का आयोजन नहीं किया गया था।
नवाचार होंगे या ढाक के तीन पात
यूं तो जिम्मेदारों की ओर से हर वर्ष नवाचारों के दावे किए जाते हैं, लेकिन स्थिति जुदा ही रहती है। अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर चुके मरु महोत्सव में शोभायात्रा, मिस्टर डेजर्ट और मिस मूमल जैसी प्रतियेागिताओं, सीसुब के ऊंटों के करतब और प्रदेश व कुछ राज्यों के लोक कलाकारों की प्रस्तुतियोंं के अलावा ज्यादातर बदलाव या नवाचार देखने को नहीं मिल रहे हैं।
यह भी उलझन
मरु महोत्सव के दौरान रात के समय आयोजित होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों के संबंध में प्रशासन व पर्यटन महकमा भी पशोपेश में पड़ जाता है।जब वह लोक सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर जोर देता है तो उसकी यह कहकर आलोचना कर दी जाती है कि, नई पीढ़ी को जोडऩे के लिए इसमें बदलाव आवश्यक है।ऐसे में जब नए जमाने में लोकप्रिय बैंड आदि को आमंत्रित किया जाता है तब कह दिया जाता है कि, यह सब तो सैलानी महानगरों में रोजाना देखते-सुनते हैं।
Published on:
23 Jan 2018 09:48 pm
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