
Rajasthan Patrika Event in Jalore Mahotsav
जालोर. शब्दों में संवेदना भरकर जब कलमकारों ने जालोर जिले के साहित्यकारों की कृतियों का बखान शुरू किया तो पूरा पंडाल साहित्य चेतना की आस्था से भर उठा। महाकवि माघ, समयसुंदर, ब्रह्मगुप्त के समय से लेकर नए युग के कलमधनिकों की कृतियों की चर्चाओं में पूरे ढाई घंटे तक साहित्यसरिक आनंद लेते रहे। मौका गुरुवार को जालोर स्टेडियम के महाकवि माघ संकुल में राजस्थान पत्रिका एवं जालोर महोत्सव समिति की ओर से आयोजित कार्यक्रम का था।
जालोर महोत्सव में पहली बार हुए इस अनूठे आयोजन को लेकर क्षेत्र के साहित्यकारों और पाठकों में उत्साह नजर आया। कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकारों ने अल्प शब्दों में बहुत सी बातें कहीं, जिससे साबित हुआ कि जालोर का साहित्य और यहां के कलमकार विलक्षण रहे हैं। उन्हें और आगे लाने की आवश्यकता है। सभी ने पत्रिका के इस प्रयास की सराहना की। कार्यक्रम में नागरिक बैंक के निदेशक नारायणलाल भट्ट, सेवानिवृत्त एसई भंवरलाल सुथार, कर्मचारी महासंघ के जिलाध्यक्ष दलपतसिंह आर्य, पदमाराम चौधरी, पेंशनर समाज के अध्यक्ष धनराज दवे, भारत विकास परिषद के वेदपाल मदान, शिव कुमार दवे, अश्विनी कुमार श्रीमाली, जनसम्पर्ककर्मी अशोक कुमार दवे, ललित दवे, प्रभुदान राव, शिक्षक संदीप जोशी, रतनसिंह मंडलावत, टेक्सी यूनियन के अध्यक्ष अम्बालाल माली, श्रीपालसिंह मादड़ी, कृष्णपालसिंह राखी, भंवरलाल राव, माधाराम माली, नारायणसिंह राजपुरोहित समेत बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे। कार्यक्रम के मुख्य समन्वयक उपखण्ड अधिकारी राजेन्द्रसिंह सिसोदिया ने किया। संचालन कर्मचारी नेता ईश्वरलाल शर्मा और राजस्थान पत्रिका के संपादकीय प्रभारी प्रदीप बीदावत ने किया।
सामाजिक सरोकारों में अग्रणी
इस मौके पर सम्बोधित करते हुए राजस्थान पत्रिका के जोनल हैड आशीष जोशी ने कहा कि पत्रिका केवल एक समाचार पत्र ही नहीं बल्कि सामाजिक सरोकाारों के साथ मानवीय चेतना का अग्रदूत भी है।
इन पुस्तकों का हुआ विमोचन
आयोजन में डॉ. उदाराम वैष्णव की संपादित और अनुवादित पुस्तक माघ (मूलत: गुर्जर भाषा में प्रकाशित) का विमोचन किया गया। इसके अलावा सांचौर क्षेत्र के साहित्यकारों के संबंध में संकलित पुस्तक (संकलनकर्ता डॉ. उदाराम वैष्णव, डॉ. हुसैन खां उत्तम और डॉ. प्रवीण पंडया) और परीक्षित पाण्डेय की पुस्तक बेटी का विमोचन पूर्व मंत्र जोगेश्वर गर्ग, भाजपा जिलाध्यक्ष रविन्द्रसिंह बालावत, जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हरिराम मीणा, उपखण्ड अधिकारी राजेन्द्रसिंह सिसोदिया, व्याख्याता अर्जुनसिंह उज्जवल आदि ने किया।
माघे सन्ति त्रयोगुणा
राष्ट्रीय स्तर के माघ पुरस्कार से सम्मानित संस्कृत के विद्वान प्रवीण पंडया ने माघ के साहित्य में वृहदता पर बोलते हुए कहा कि माघ अर्थगौरव, उपमा और पद लालित्य तीनों गुणों से पूरित साहित्य लिखते थे। उन्होंने कहा कि जिस तरह प्रकृति का वर्णन माघ ने किया है। वह अद्वितीय, अनूठा और विशिष्ट है। पंडया ने कहा कि माघ का साहित्य न केवल भारत बल्कि विदेशों तक में अनुवादित हुआ है।
अद्भुत-अनूठा-विलक्षण
भीनमाल के डॉ. अरुण दवे ने महाकवि माघ के काव्य में कलापक्ष को प्रस्तुत किया। उन्होंने महाकवि माघ के साहित्य में श्लोकों के विश्लेषण के माध्यम से उनकी विद्वता का बखान किया। उन्होंने कहा कि कवि माघ ने साहित्य रचना में दिल के साथ ही दिमाग का बखूबी उपयोग किया है। माघ के गौमात्रिका समेत अनेक छंदों का प्रयोग विलक्षण और अद्भुत है।
समयसुंदर की सौ रचनाएं
सांचौर के प्राच्य साहित्यकार समयसुंदर का उल्लेख करते हुए डॉ. उदाराम वैष्णव ने कहा कि समयसुंदर ने सौसे अधिक रचनाएं लिखी। बताया जाता है कि अकबर के समय समयसुंदर लाहौर में थे। उस वक्त पड़े अकाल और उस दौर के हालातों का वर्णन भी किया। उन्होंने कहा कि गुजरात के पाठï्यक्रमों में समयसुंदर को पढ़ाया जाता है।उन्होंने सांचौर के साहित्यकारों पर भी जानकारी दी।
तत्काल रची कुण्डली
विरद विनय सतसई का जिक्र करते हुए गुर्जर सूफी संत कवियों की हिन्दी साहित्य को देन विषय में पीएचडी डॉ. हुसैन खां शेख ने कार्यक्रम के दौरान ही जालोर महोत्सव पर कुण्डलियां छंद में रचना प्रस्तुत कर सुनाईतो मौजूद कलम रसिकों ने खूब दाद दी। पत्रिका के आयोजन की तारीफ करते हुए शेख ने गुर्जर साहित्य और सतसईके कईदोहे सुनाए और क्षेत्र की साहित्यक धरोहर को संजोने की आवश्यकता जताई।
मिथक तोडऩे का प्रयास
अधिवक्ता हरिशंकर राजपुरोहित ने पाली राज्य के इतिहास पर जानकारी देते हुए कहा कि कुछ इतिहासकारों ने जयचंद विरोधी साहित्य रचा है। जबकि उन्होंने अपनी रचना में जयचंद के पक्ष को उजागर किया है और इस मिथक को तोडऩे का प्रयास किया है।
जैन साहित्य खूब लिखा
जालोर में जैन साहित्य पर चर्चा करते हुए वरिष्ठ पत्रकार भंवरसिंह सोलंकी ने कहा कि जालोर में उद्योतनसूरि, राजेन्द्रसूरी, मुनि कल्याणविजय, हेमचन्द्रसूरि आदि मुनियों ने जैन साहित्य लिखा।उन्होंने स्थानीय आंचलिक कवियों की तीसा की बाढ़ जैसी कविताओं का उल्लेख करते हुए मरते हुए आंचलिक साहित्य को पुनर्जीवन की आवश्यकता जताई।
परकाया प्रवेश अभिनय से
परकाया प्रवेश जैसी कल्पनाएं अभिनय के माध्यम से ही रंगमंच पर साकार हो सकती है। रंगकर्मी जितेन्द्र जालोरी ने यह कहते हुए रंगमंच पर होने वाले नाटक की परम्परा को उल्लेखित किया। उन्होंने नाटक के क्षेत्र में जालोर के योगदान पर भी जानकारी दी। जालोर ने जालोर के साहित्य में नैनमल जैन, लालदास राकेश, श्रीमंत कुमार व्यास व डॉ. गंगासिंह पर भी जानकारी दी।
गुनहगार गजल पर झूमे
रामेश्वरदयाल श्रीमाली की कृतियों की चर्चा करते वक्त प्रमोद श्रीमाली ने जब उनकी रचना 'आ आपरै जिसी ही गुनहगार है गजलÓ सुनाई तो हर कोई झूम उठा। प्रमोद ने श्रीमाली के कृतित्व और व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए उनके रचनाकाल के बारे में बताया और कहा कि श्रीमाली राजस्थानी साहित्य की नींव रखने वालों में थे। उन्होंने साहित्य सृजन के साथ-साथ नई पीढ़ी के साहित्यकार भी तैयार किए।
इन्होंने प्रस्तुत की रचनाएं
रानीवाड़ा से आए शिक्षक परीक्षित पाण्डेय ने अपने मुक्तक 'हा! विधाता मेरी अब तो जोड़ी गईÓ व ओज से परिपूर्ण कविता 'मेरा हिन्दुस्तान मिलेÓ के माध्यम से श्रोताओं का दिल जीत लिया। वीर बहादुरसिंह असाड़ा ने वियोग और श्रंगार रस से परिपूर्ण गीत प्रस्तुत किया। वहीं भाजपा स्वच्छता प्रकोष्ठ के प्रदेश प्रमुख मानवेन्द्र राजपुरोहित सांथू ने 'वीरमदेवÓ कविता के माध्यम से जालोर के उस ऐतिहासिक दिन का सजीव चित्रण किया, जब खिलजी से युद्ध करते वीरमदेव वीरगति को प्राप्त हुए थे और जालोर में जौहर हुआ।
Published on:
16 Feb 2018 11:39 am
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