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मजदूर दिवस : श्रमिक 20000, पंजीकृत 7000

जांजगीर-चांपा जिले में 20 हजार से ज्यादा मजदूर कार्यरत हैं, लेकिन श्रम विभाग की पंजी में सिर्फ 25 फीसदी मजदूरों की संख्या दर्ज है। श्रम विभाग की मानें तो जिले में 500 पंजीकृत ठेकेदार हैं, वहीं पंजीकृत मजदूरों की संख्या 7 हजार है।

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Meenu Tiwari

May 01, 2015

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Labor Day, Workers 20000 registered 7000

जांजगीर-चांपा. जांजगीर-चांपा जिले में २० हजार से ज्यादा मजदूर कार्यरत हैं, लेकिन श्रम विभाग की पंजी में सिर्फ २५ फीसदी मजदूरों की संख्या दर्ज है। श्रम विभाग की मानें तो जिले में ५०० पंजीकृत ठेकेदार हैं, वहीं पंजीकृत मजदूरों की संख्या ७ हजार है। ये आंकड़ें विभाग के अनुसार भले ही सही हो सकते हैं, लेकिन वास्तव में पंजीयन के आंकड़े से कई गुना ज्यादा मजदूर जिले में अपना पसीना बहा रहे हैं। ऐसे मजदूरों का श्रम विभाग में कोई रिकार्ड नहीं है।

जिले में संचालित व निर्माणाधीन औद्योगिक इकाईयों के अलावा अन्य निर्माण कार्यो में मजदूरों की अहम् भूमिका है, लेकिन उन्हीं मजदूरों को अपने जायज हक के लिए दर-दर की ठोंकरें खानी पड़ रही है। शासन-प्रशासन की उदासीनता से श्रमिकों की दशा लगातार बद्तर होती जा रही है। आलम यह है कि उन्हें शासन से मिलने वाली सुविधाएं तो दूर, निर्धारित मजदूरी के लाले पड़ गए हैं। शासन द्वारा निर्धारित मानकों का कहीं भी पालन नहीं हो रहा है। ठेकेदार व औद्योगिक इकाई प्रबंधन मजदूरों का शोषण करने पर अमादा है। जिले में २० हजार से ज्यादा मजदूर कार्यरत है, लेकिन पंजीकृत मजदूरों की संख्या ७ हजार है। विभिन्न कामों में पसीना बहा रहे मजदूरों को उनका जायज हक श्रम विभाग के अफसर भी नहीं दिला पा रहे हैं।

सबसे खराब स्थिति असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की है, जिन्हें अपने अधिकारों के बारे में पता तक नहीं है। यही वजह है कि बहुत से स्थानों पर तो 'मजदूर दिवसÓ पर भी मजदूरों को 'कोल्हू के बैलÓ की तरह 14 से 16 घंटे तक काम करते देखा जा सकता है। यानी जो दिन पूरी तरह से उन्हीं के नाम कर दिया गया है, उस दिन भी उन्हें दो पल का चैन नहीं।


इससे भी ज्यादा बदतर स्थिति बाल एवं महिला श्रमिकों की है। जिले में संचालित ईंट भट्ठों, क्रशर खदानों, पॉवर कंपनियों सहित अन्य निर्माण स्थलों पर महिला श्रमिकों का आर्थिक रूप से तो शोषण हो ही रहा है, साथ ही उनका शारीरिक रूप से भी शोषण किए जाने की शिकायतें आए दिन सामने आ रही है, लेकिन अपना व बच्चों का पेट भरने के लिए चुपचाप सब कुछ सहते रहना इन महिला मजदूरों की जैसे नियति ही बन गई है।

कागजों में चल रहा कर्मकार मंडल

श्रमिकों के उत्थान के लिए राज्य सरकार द्वारा कर्मकार कल्याण मंडल की स्थापना की गई है। मंडल की स्थापना का मुख्य उद्देश्य मजदूरों को उनका जायज हक दिलाना है, लेकिन कर्मकार मंडल सिर्फ कागजों में चल रहा है। मंडल से लाभान्वित करने के लिए बनाई गई योजनाएं केवल पंजीकृत मजदूरों के लिए ही है। लिहाजा, इसका लाभ असंगठित मजदूरों को नहीं मिल पा रहा है। श्रम विभाग मजदूरों को पंजीकृत कर योजनाओं का लाभ दिलाने गंभीर नहीं है। वहीं कार्यस्थलों पर सुरक्षा के माकूल इंतजाम तक नहीं है, जिसकी वजह से फैक्ट्रियों में आए दिन श्रमिकों को दुर्घटना का शिकार होना पड़ रहा है।

मई दिवस की औपचारिकता

विश्व मजदूर दिवस के मौके पर शुक्रवार को जिले के विभिन्न स्थानों में बड़ी-बड़ी सभाएं होगी, जिनमें मजदूरों के हितों की बड़ी-बड़ी योजनाएं बनेगी और ढेर सारे लुभावने वायदे किए जाएंगे, जिन्हें सुनकर एक बार तो यही लगेगा कि मजदूरों के लिए अब कोई समस्या ही बाकी नहीं रहेगी। लेकिन, अगले ही दिन मजदूरों को अपना जायज हक पाने के लिए मशक्कत करनी पड़ेगी, फिर भी उन्हें हक से महरूम होना पड़ेगा। मई दिवस अब महज औपचारिक बनकर रह गया है।

कर रहे जागरूक

पंजीयन के अभाव में मजदूरों को शासकीय योजनाओं के लाभ से वंचित होना पड़ता है। जिले में कार्यरत मजदूरों को शासकीय योजनाओं का लाभ मिल रहा है। कर्मकार मंडल से सैकड़ों मजदूर लाभान्वित हुए हैं। श्रम विभाग द्वारा मजदूरों को जागरूक किया जा रहा है।

राकेश आदिले, श्रम पदाधिकारी