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शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रयागराज के माघ मेले से लौटने का ऐलान करते हुए कहा कि उन्हें बिना स्नान किए, भारी मन से इस पावन भूमि को छोड़ना पड़ रहा है। उन्होंने दुख जताते हुए कहा कि ऐसी स्थिति की उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। यह घटना न सिर्फ आत्मा को झकझोरने वाली है, बल्कि न्याय और मानवता पर सामूहिक भरोसे को भी सवालों के घेरे में खड़ा करती है।
अविमुक्तेश्वरानंद ने आगे कहा कि जो कहना था, कह चुके हैं, लेकिन एक महत्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट करना जरूरी है। कल प्रशासन की ओर से ब्रह्मचारी के माध्यम से और मुख्य कार्याधिकारी चंद्र प्रकाश उपाध्याय द्वारा पत्र भेजा गया। उसमें कहा गया कि सम्मानपूर्वक पालकी से संगम ले जाकर अधिकारियों की मौजूदगी में स्नान कराया जाएगा।
उन्होंने कहा कि प्रयागराज की धरती सदैव आस्था, शांति और आत्मिक शुद्धता का केंद्र रही है। हम भी श्रद्धा और धार्मिक शांति की भावना से यहां आए थे। लेकिन अब ऐसी निराशाजनक परिस्थिति में वापस होना पड़ रहा है। यह घटना हमारी कल्पना से परे है और आत्मा को कचोटने वाली है। न्याय और मानवता पर विश्वास को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।
प्रयागराज के माघ मेले में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़े विवाद की शुरुआत 18 जनवरी को हुई, जब संगम स्नान के लिए जा रही उनकी पालकी को पुलिस ने रोक दिया। इस कार्रवाई पर शिष्यों ने विरोध जताया और कथित तौर पर धक्का-मुक्की तथा शिखा पकड़कर घसीटे जाने के आरोप सामने आए। घटना के बाद अविमुक्तेश्वरानंद शिविर के बाहर धरने पर बैठ गए और कई दिनों तक शिविर में प्रवेश नहीं किया।
विवाद तब और बढ़ गया जब प्रशासन ने दो दिनों में दो नोटिस जारी करके उनसे शंकराचार्य होने का प्रमाण मांगा। अविमुक्तेश्वरानंद ने इसका लिखित जवाब भेजा, लेकिन इसी बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बिना नाम लिए ‘कालनेमि’ शब्द का प्रयोग किया, जिसने विवाद को धार्मिक-सांस्कृतिक दायरे से राजनीतिक आयाम तक पहुंचा दिया।
अविमुक्तेश्वरानंद ने जवाब में योगी की तुलना औरंगजेब से कर दी, जिससे विमर्श और तीखा हो गया। परिणामस्वरूप संत समुदाय दो धड़ों में विभाजित दिखाई दिया, हालांकि तीनों शंकराचार्य उनके समर्थन में खड़े रहे। अविमुक्तेश्वरानंद की मुख्य मांग प्रशासनिक माफी की रही, जिसके बिना वे संगम स्नान न करने का निर्णय लेकर बैठे रहे। इस घटनाक्रम का असर सरकारी ढांचे में भी देखने को मिला। बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट ने 26 जनवरी को उनके समर्थन में इस्तीफा दे दिया, जबकि अगले ही दिन अयोध्या के डिप्टी कमिश्नर प्रशांत कुमार ने मुख्यमंत्री के पक्ष में पद छोड़ दिया।
Updated on:
28 Jan 2026 11:36 am
Published on:
28 Jan 2026 10:57 am
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