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 शिरीष पेड़ के नीचे होती है माता की आराधना

नवरात्रि पर्व पर मां शिरिष पाठ की छठा देखते ही बनती है, जहां स्थानीय अंचलों सहित दूर-दराज से श्रद्धालु प्रतिदिन दर्शन करने पहुंचते है।

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Piyushkant Chaturvedi

Apr 11, 2016

tree of mother worship

Shirish is under the tree of mother worship

जांजगीर-चांपा.
नवरात्रि पर्व पर मां शिरिष पाठ की छठा देखते ही बनती है, जहां स्थानीय अंचलों सहित दूर-दराज से श्रद्धालु प्रतिदिन दर्शन करने पहुंचते है। दंतकथा पर आधारित शिरिष पाठ में स्थापित मां की प्रतिमा के साथ शिरिष पेड़ की पूजा किए जाने का विधान प्राचीनकाल से हैं। यह कथा जिला मुख्यालय जांजगीर के पामगढ़ विकासखण्ड की समीपस्थ ग्राम डोंगाकोहरौद की हैं, जिसमें प्रचलित कथा के अनुसार नाव और महिला की कथा प्रचलित हैं। इस प्रचलित कथा में गर्भवती महिला का नाव से पार करने की कहानी हैं, जिसके अनुसार यात्री भरी नाव महानदी में पार कर रहा था, तभी नाव बीच मजधार में रूक गई, जिसका कारण नाव में सवार गर्भवती महिला की सवार होने की कहानी प्रचलित हैं।


मजधार में नाव रूकने पर नाविक ने यात्रियों से पूछा कि कोई गर्भवती महिला इसमें सवार हैं, तब एक यादव समाज की महिला ने स्वीकार किया कि वे गर्भवती हैं, तब नाविक ने उसे मानता मांगने के लिए कहा और इसके बाद नाव नदी पार हो गया। यह महिला ग्राम डोंगाकोहरौद की रहने वाली थी और उसने बच्चा पैदा होने के पश्चात अपना मानता पूरा नहीं किया, तब शिरिष पेड़ से बना एक नाव पुरातन काल में टार-नाला के सहारे नदी से गांव की बंधवा तालाब तक जा पहुंचा और तालाब में स्नान कर रही मानता मांगने वाली महिला को अपने चपेट में ले लिया।


घटना की जानकारी गांव में फैल गई, तब उसके पति ने कुल्हाड़ी लेकर तालाब पहुंचा और घटनाकारित नाव को तालाब से पकड़ बाहर निकाला। कुल्हाड़ी से उसके टूकड़े-टूकड़े कर दिए। इस घटना के कुछ दिन बाद गांव में प्राकृतिक आपदा आ गई और सभी प्रमुख मार्गो में जगह-जगह शिरिष का पेड़ उग आया, जिस पर गांव वालो ने दैविक आपदा मानकर एक यज्ञ कराया तथा जगह-जगह उगे शिरिष पेड़ को काटकर सिर्फ यज्ञ स्थल के पेड़ को बाकी रखा। इसके पश्चात उस पेड़ की पूजा गांव की प्रमुख देव के रूप में सैकड़ो वर्ष पूर्व से जाती रही हैं तथा उसमें काली फीता-चूड़ी बांधकर अपना-अपना मन्नत मांगने की विधान चलते रहा।


प्रारंभ में उस स्थल पर करीब 20 फीट के चबूतरे पर सात शिरिष पेड़ था, जहां ग्रामवासी सभी प्रमुख त्यौहारों में पूजा-अर्चना करते थे, किन्तु वर्ष 2000 के बाद गांव के प्रबुद्धजनों द्वारा उस स्थल की विकास के लिए ध्यान देना प्रारंभ किया किन्तु विकास के लिए चारो तरफ गांववासियों का दो फसली खेत का होना अड़चन था। इस स्थिति में गांव वालों ने एक समिति बनाकर उस स्थल के विकास के लिए शिरिष पेड़ के चबूतरे से जुड़े भूमि को किसानों से दान के रूप में मांगा और पंचायत की सहयोग से एक छोटा मंदिर बनाया।

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