
सुविधाओं का ध्यान नहीं और फिर नया स्कूल खोलने दर्जनों कतार में
जांजगीर-चांपा. जिले में ४५० से अधिक निजी स्कूल संचालित है। जिसमें तकरीबन ५० फीसदी स्कूलों में ही स्कूल संचालन के नियमों का पालन किया जा रहा होगा, शेष स्कूलों में नियम कानून दरकिनार है। बड़ी बात यह है कि शिक्षा का अधिकार नियम लागू होने के बाद भी संचालक नियमों का पालन कर रहे हैं वहीं ऐसे स्कूलों को मान्यता देने वालों की भी महिमा अपरंपार है। जिसके चलते स्कूली छात्रों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ऐसा नहीं है कि ऐसे स्कूलों में बतौर फीस मोटी रकम नहीं ली जाती है, ऐसे स्कूलों में छात्रों से मोटी फीस लेने के बाद भी सुविधाएं नहीं दी जाती। दिलचस्प बात यह है कि हर साल की तरह इस साल भी ऐसे निजी स्कूल खोलने करने वालों की बाढ़ आ गई है।
जिले में निजी स्कूलों की संख्या ४५० का आंकड़ा पार हो चुका है। इन स्कूलों में शिक्षा के अधिकार नियम का पालन नहीं किया जा रहा है। ऐसे निजी स्कूलों में न तो प्रशिक्षित शिक्षक हैं और न ही स्कूलों में छात्रों के लिए अधोसंरचना की माकूल सुविधा है। जिसके चलते छात्रों को तालीम लेने कई तरह की असुविधाओं का सामना करना पड़ रहा है। हर साल की तरह इस साल भी निजी स्कूल खोलने के लिए दर्जनों लोग कतार में हैं। जिनके पास सुविधा हो या न हो लेकिन उन्होंने आवेदन डीईओ आफिस में जरूर जमा किया है। आवेदन पत्रों की स्कू्रटनी की जा रही है। वहीं आवेदन में क्या क्या खामियां है इसकी जानकारी स्कूल संचालकों को बताया जा रहा है। डीईओ आफिस में ऐसे दो दर्जन से अधिक आवेदन लंबित है।
नोडल अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध
निजी स्कूल खोलने के बाद संबंधित क्षेत्र के शिक्षा अधिकारियों को नोडल अधिकारी बनाया जाता है। जरूरी नहीं है कि नोडल अधिकारी बीईओ केटेगरी का अफसर हो। शासकीय हायरसेकंडरी स्कूल के प्राचार्यों को भी नोडल अधिकारी बनाया जाता है। नोडल अधिकारी चंद रुपयों के लालच में आंख मूंदकर ऐसे स्कूलों को मान्यता दे देते हैं।
ऐसे होते हैं हालात
जिन निजी स्कूलों का मान्यता ताक में रखकर दी जाती है। उन स्कूलों में न तो शौचालय, बिजली पानी की सुविधा होती है बल्कि स्कूल बिल्डिंग भी ढंग का होता है। चंद कमरों में स्कूल संचालित होते हैं। जहां बच्चों को बैठने में घुटन महसूस होता है। ऐसे स्कूलों में शिक्षा के अधिकार के तहत जो मापदंड तय किए होते हैं वह सुविधाएं नहीं होती। इतना ही नहीं ऐसे स्कूलों में छात्रों से शिक्षा के नाम पर फीस भी अधिक ली जाती है। अभिभावक भी बच्चों की अच्छी शिक्षा के नाम पर ठगे जाते हैं।
केएस तोमर, डीईओ
Published on:
29 May 2019 12:15 pm
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