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ब्रांडेड की जगह प्रोपेगेंडा की दवाओं का बाजार गर्म

'धरती के भगवानÓ कहे जाने वाले डॉक्टर इन दिनों मरीजों की सेहत से खिलवाड़ कर रहे हैं। दरअसल, डॉक्टर ऐसी दवाएं लिख रहे हैं जो प्रोपेगेंडा (प्रचार-प्रसार) आधारित है। इन दवाओं से उन्हें न केवल फार्मास्युकल कंपनियों से बड़ा पैकेज मिलता है बल्कि कमीशन भी बड़ी तय की गई होती है। जिसका असर ब्रांडेड कंपनियों पर पड़ रहा है। वहीं दूसरी ओर मरीजों की सेहत से भी खिलवाड़ हो रहा है।

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ब्रांडेड की जगह प्रोपेगेंडा की दवाओं का बाजार गर्म

ब्रांडेड की जगह प्रोपेगेंडा की दवाओं का बाजार गर्म

जांजगीर-चांपा। दवा का बाजार इन दिनों केवल प्रचार-प्रसार आधारित हो चुका है। लोकल कंपनियां स्थानीय लेवल पर पैठ जमा डॉक्टरों को पैकेज देते हैं। इस आधार पर डॉक्टर मरीजों को दवा लिख रहे हैं। ऐसी दवाओं से मरीज आसानी से ठीक नहीं होता, बाद में वे लौटकर फिर उन्हीं डॉक्टरों के पास जाता है। दूसरी विजिट में डॉक्टर दवाओं का ब्रांड चेंज कर देते हैं। जिससे मरीज ठीक हो जाता है। मार्केट में ऐसी कंपनियों का बाजार गर्म है। दरअसल, ऐसी कंपनियां अपने एमआर (मेडिकल रिपे्रजेंटेटिव) के बदौलत बड़ा मार्केट तैयार कर डॉक्टरों को अपने कब्जे में लेकर कारोबारी कर रहे हैं। मेडिकल स्टोर्स के संचालक ने बताया कि बाजार में इन दिनों छोटी-छोटी ढेर सारी कंपनियां जो गुजरात, बड्डी हिमाचल प्रदेश छत्तीसगढ़ सहित अन्य प्रदेशों में दवा कंपनियां खोल रखी है और एमआर के सहारे अपनी पैठ जमा ली है।
केस वन
ओल्केयर कंपनी जो गुजरात की है। यह कंपनी ओल्सीफोन नाम की एंटीबायोटिक दवा निकाल रही। इस कंपनी की दवा स्थानीय डॉक्टर बड़ी तादात में लिख रहे हैं। जबकि ब्रांडेड कंपनियां धूल फांस रही है।
केस टू
चंडीगढ़ की कंपनी कैपटैब जो कफ सिरप की दवा बिकवा रही। जिसे स्थानीय डॉक्टर बड़ी तादात में लिख रहे। जबकि कफ सिरप के लिए और भी अच्छी ब्रांडेड कंपनियों की दवा बाजार में है।
केस थ्री
बड्डी हिमाचल प्रदेश की दवा कंपनी एक्लीमेट लाइफ साइंस कंपनी शुगर की दवा जुमेराइड वन निकाल रही। यह दवा भी स्थानीय बाजार में धमाल मचाई है। क्योंकि अब हर चौथे घर में शुगर के मरीज हैं। जिसके लिए मरीजों को स्थानीय डॉक्टर इसी दवा को लिख रहे हैं।
क्या कहते हैं डॉक्टर
जब हम इस संबंध में स्थानीय फेमस डॉक्टरों से बात की तो निरूत्तर हो गए। डॉ. यूसी शर्मा ने कहा कि मरीजों को उनकी सेहत के हिसाब से दवा लिखा जाता है। कोई भी दवा प्रचार-प्रसार आधारित नहीं रहता। इसी तरह डॉ. पीके नरूला ने कहा कि मुझे यह नहीं पता कि प्रोपेगेेंडा क्या होता है। हमें जो उचित लगता है वही दवा लिखते हैं। लोग कुछ भी बोले हमें फर्क नहीं पड़ता।
वर्जन
हमें अब तक इस तरह की किसी प्रकार की शिकायत नहीं मिली है। आपसे से पहली बार इस तरह की शिकायत मिली है। यदि ऐसा है तो ऐसी दवाओं का सेंपल लिया जाएगा और सेंपल को लैब भेजा जाएगा। इससे ब्रांड व मिस ब्रांड की पता चल पाएगा।
-प्रीतम ओगे्र, उप संचालक खाद्य एवं औषधि प्रशासन
यह बड़ा सवाल
० दवा पर उठ रहे गुणवत्ता पर सवाल
० मिस ब्रांड दवा की शिकायत
० पब्लिक की जेब में डाका
० प्रिंट की कीमत में बड़ा अंतर
० ड्रग की सेंप्लिंग आज तक नहीं
० कमीशन का बड़ा खेल
० डॉक्टरों से साठगांठ का आरोप

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