
पत्थलगाव. प्रकृति मे कितना भी बदलाव आ जाए कितनी भी आधुनिकता सर चढ़कर बोले लेकिन कुछ चीजें ऐसी होती है जिसका साथ कभी नही छूट सकता उनमें से एक है मिट्टी से बने मटके। आज भी मटके के ठंडे पानी से आती सोंधी खुशबु गले के रास्ते दिल में उतर जाती है। आधुनिकता के इस चकाचौंध भरे दौर में इलेक्ट्रानिक वाटर कुलर की बढती मांग के कारण कुम्हारो का पुस्तैनी धंधा चौपट होते नजर आ रहा है। लेकिन गर्मी की दस्तक के साथ ही बाजारो में मिट्टी के मटकों के खरीददार आज भी भारी मात्रा मे नजर आ रहे है। एक ओर जहा महंगाई डायन की मार का असर इन देशी मटको व सुराही पर स्पष्ट झलक रहा है। वहीं आधुनिक इलेक्ट्रानिक फ्रीजर की वजह से कुम्हारो द्वारा निर्मित देंशी फ्रिज की मांग पर भी बुरा असर पडा है। लेकिन कहीं ना कहीं इनकी मांग आज भी बरकरार है। बाजारपारा मे मटका बेचने आए एक कुम्हार ने बताया कि उनके इस पुस्तैनी धंधा पर आधुनिकता का असर पड़ा है। मेहनत के एवज में मेहनताना भी निकलना मुश्किल हो गया है वहीं शासन से किसी प्रकार की मदद ना मिलने से इस धंधे पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। पर इसे बचाने की पहल जारी है।
100 से 130 रुपए में बिक रहा मटका : इन दिनो बाजार मे मटके 100 से 130 रूपयें में बिक रहे है जहा गर्मी की तपिस बढऩे से साथ ही मटका खरीदने वालों की संख्या बढेगी और ऐसे में स्वाभाविक है कि बाजारो में मटको की कीमत में इजाफा दर्ज होगा। जिसे देखते हुऐ कुम्हारों के चेहरे मे कुछ रौनक दिखाई पड रही है। इलेक्ट्रानिक फ्रिजों का चलन होने के बावजूद भी शहरो में मटके का उपयोग करने वालो की कमी नहीं है क्योकि मटको की सोंधी खुशबु वाला पानी सभी को पसंद आता है। वहीं मटको के पानी से स्वास्थ्य पर भी विपरीत असर नही पडता। गृहणी शकुन अग्रवाल का कहना है कि गर्मी के शुरू होते ही मटका रख लिया जाता है,छोटे बच्चे भले ही फ्रीज का पानी पसंद करते है लेकिन घर के सभी बडे लोग मटके के ठंडे पानी से ही प्यास बुझाना पसंद करतें है। उन्होने कहा कि मटके के ठंडे पानी के लिए कुछ रुपए जरूर खर्च करने पडते है। लेकिन इसके उपयोग से ना किसी प्रकार के बिजली का खर्च वहन करना पडता और ना ही स्वास्थ्य पर विपरीत असर देखने को मिलता है।
Published on:
26 Apr 2018 09:09 am
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