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बिरहोर जनजाति के उत्थान के लिए पूरा जीवन कर दिया समर्पित

जगेश्वर राम की कोशिशों से बिहोर गांव में हुई सड़क, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाएं मयस्सर

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बिरहोर जनजाति के उत्थान के लिए पूरा जीवन कर दिया समर्पित

जशपुरनगर/बगीचा. प्रदेश में मात्र तीन हजार की जनसंख्या वाले विलुप्त प्राय विशेष संरक्षित बिरहोर जनजाति के उत्थान के लिए एक इंसान ने नंगे पांव अपनी पूरी जिंदगी बीता दी। उस इंसान की पहल से पिछले 40 सालों के अथक प्रयास से आदि मानव की तरह जीवन यापन करने वाले बिरहोर जनजाति के लोग अब आत्मनिर्भर बन चुके हैं और सामाजिक जीवन जी रहे हैं।
जशपुर जिले के बगीवा विकासखंड के भीतघरा ग्राम पंचायत के शिवरीनारायण में बसे बिरहोर जनजाति के लोग आज से 40 साल पहले आदि मानव की तरह जीवन यापन करते थे। घने जंगलों के बीच इस जनजाति के लोग बिना कपडों के झोंपड़ी में रहा करते थे और जंगली जानवरों का शिकार कर कंदमूल खाकर अपना जीवन यापन करते थे और अज्ञानता की वजह से कई बार मरे हुए जंगली जानवरों के मांस खाने की वजह से इस जनजाति के कई लोगों की मौतें भी हो रही थी, इस जनजाति के इस हालात को देखकर पड़ोस के गांव अम्बाटोली निवासी जगेश्वर राम ने इनके उत्थान का बीड़ा उठाया। इस जनजाति के लोग अपने समाज के बाहर के लोगों से दूर रहा करते थे और उनसे कोई मेल जोल रखना पसंद भी नही करते थे, यदि कोई इनसे मिलने की कोशिश भी करता तो जनजाति के लोग डरकर जंगलों में छिप जाया करते थे, लेकिन ऐसी परिस्थिथियों के बीच जगेश्वर राम ने इनके साथ समय बिताना शुरू किया। उनसे मेल-जोल बढ़ाने के लिए वो हफ्तों तक उनके साथ रह जाया करते थे। उसके बाद उन्होंने बिरहोर जनजाति के लोगों को समझाइश देना शुरू किया। बिराहोर जनजाति के उत्थान के लिए उन्होंने तात्कालीन पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी से मिलकर जगेश्वर राम ने इस विलुप्त होती जनजाति को विशेष संरक्षित जनजाति का दर्जा देने की मांग भी की थी और जगेश्वर राम ने यह प्रण लिया था कि जब तक विशेष संरक्षित जनजाति का दर्जा नही मिल जाता तब तक वो शादी नही करेगा। इन प्रयासों से इस जनजाति को विशेष संरक्षित जनजाति का दर्जा मिला।

मिल चुका है शहीद वीरनारायण सिंह पुरस्कार : बिरहोर जनजाति के लोग भले ही जंगलों में ना रहकर जंगलों के किनारे रहते हैं लेकिन जंगली जानवरों के मांस और कंदमूल खाने वाले बिरहोरों ने अब जंगली जानवरो का शिकार बंद कर दिया है। अब वे खेती करते हैं, पशुपालन करते हैं और आम इंसानों की तरह भोजन करते हैं। इस जनजाति का मुख्य व्यवसाय रस्सी बनाकर बेचना है और आजीविका का मुख्य साधन भी। इस गांव में जगेश्वर राम की पहल पर सड़क, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध हैं। जगेश्वर राम को अब इस जनजाति के लोग भगवान मानते हैं। इस जनजाति के उत्थान के लिए अपनी पूरी जिंदगी बिता देने वाले जगेश्वर राम को 2015 में छत्तीसगढ़ सरकार ने शहीद वीरनारायण सिंह पुरस्कार से भी सम्मानित किया है। समाजसेवक जगेश्वर राम ने पूरी जिंदगी बिरहोरों के उत्थान के लिए नंगे पांव रहने का भी संकल्प लिया था और आज भी ये नंगे पांव ही रहते हैं।

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