यह है माधोपट्टी, 47 IAS दिए, फिर भी विकास से दूर

मिट्टी का कर्ज भूले माधोपट्टी के होनहार, आखिर कब होगा इस छोटे से गांव का विकास

जौनपुर. यह कहानी है एक छोटे से गांव माधोपट्टी की। 75 घर वाले इस गांव से 47 आईएएस निकले, लेकिन गांव की दशा नहीं बदली। आज भी यह गांव इंतजार कर रहा है कि कोई आएगा और विकास की गंगा बहाएगा। गांव के लिए अच्छी बात यह कि यहां से होनहार निकलते हैं और बुरी बात यह कि आईएएस और पीसीएस बनने के बाद कोई भी मुड़कर नहीं देखता। नतीजतन विकास की गंगा अब भी गांव की सरहद के पार होते हुए निकल जाती है।
गद्दीपुर ग्राम सभा की कुल आबादी करीब चार हजार है। इसी ग्रामसभा में आने वाले माधोपट्टी गांव में भी करीब 75 घर हैं। इन घरों में सदस्यों की संख्या भी तीन सौ के करीब है। इन 75 घरों में 47 आईएएस और दर्जनों पीसीएस रैंक के अधिकारी गैर जनपदों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। लेकिन जिला मुख्यालय से सटे अपनी जन्मभूमि की सेवा करने का वक्त किसी के पास नहीं है। शिक्षा के नाम पर गांव में दो इंटर काॅलेज हैं। श्री गांधी राम निरंजन इंटर काॅलेज और श्री निवास मिश्रा इंटरमीडिएट काॅलेज। एक डिग्री काॅलेज सरजू प्रसाद महाविद्यालय भी है। तीन प्रइमरी स्कूल भी गांव में मौजूद हैं, जिनका हाल और प्राथमिक विद्यालयों की तरह दयनीय है। मिला जुलाकर गांव में शिक्षा का स्तर औसत से बेहतर है।

स्वास्थ्य सेवाओं का बुरा हाल
स्वास्थ्य सेवाओं का यहां टोटा है। किसी जमाने में एक छोटा सा अस्पताल हुआ करता था। एक हकीम साहब लोगों की नब्ज टटोलकर इलाज कर दिया करते थे। लेकिन अब वो भी खत्म हो गया। प्रशासन ने गांव में एक होम्योपैथिक चिकित्सालय खोल दिया, लेकिन यहां तैनात चिकित्सक के दर्शन भी लोगों को नहीं हुए। महज एक कंपाउंडर है जिसको लोग चिकित्सक मानकर गाहे बगाहे होम्योपैथ की मीठी दवा ले लेते हैं। इसके अलावा इमरजेंसी सेवाओं के लिए जिला अस्पताल करीब 12 किलोमीटर दूर पड़ता है। नजदीकी छोटा अस्पताल 6 किलोमीटर दूर सिरकोनी ब्लाॅक पर है, लेकिन वो भी जर्जर हाल में।

बस सेवा भी अब बंद
परिवहन विभाग ने 1992 में एक सिटी बस चलाई थी। ये बस कचगांव से चैकियां तक जाती थी। इसी एकमात्र सहारे से वाहन विहीन लोग जौनपुर पहुंच जाते थे। लेकिन 2004 में इस बस सेवा को भी बंद कर दिया गया। स्वच्छ जल के लिए पानी की टंकी बन गई है, लेकिन अभी पानी की सप्लाई शुरू नहीं हो सकी है। जलकल विभाग ने उम्मीद दिलाई है कि जल्द ही पानी की सप्लाई शुरू हो जाएगी। बीएसएनएल ने कुछ दिनों पहले अपना मोबाइल टाॅवर खड़ा कर दिया, लेकिन वो भी शोपीस ही बना हुआ है। गांव को जोड़ने के लिए दो लिंक रोड हैं जो अंदर और बाहर दोनों ओर से गांव को शहर से जोड़ते हैं। बिजली गांव के शेड्यूल के मुताबिक सिर्फ जाती है। आने का ठिकाना नहीं होता। और एक बार भी ट्रांसफार्मर फुंक गया तो कई हफ्तों की फुरसत हो जाती है। गांव निवासी सजल सिंह का कहना है कि इस गांव में सिर्फ एक बार विकास हुआ था, जब धनंजय सिंह ने सांसद रहते 15 लाख रूपये खर्च कर गांव में इंटरलाॅकिंग करवाई थी। 15 इंडिया मार्का हैंडपंप से गांव के लोगों की प्यास बुझाने का इंतजाम किया था। जर्जर हो चुके बिजली के तारों को भी बदलवाया। लेकिन इस हादसे को भी अब कई साल गुजर गए हैं। मौजूदा सांसद तो इस ओर झांकने भी नहीं आते। वीरेंद्र सिंह का कहना है कि गांव के जितने भी पूर्व प्रधान थे सभी ने आजतक सिर्फ लूटने खाने का काम किया। नए प्रधान वासुदेव यादव से विकास की कुछ उम्मीदें बंधीं हैं। अपने लोग तो बाहर जाकर पराए हो गए। वीरेंद्र सिंह का कहना है कि विकास के लिए जितना प्रयास होना चाहिए था गांव से निकले होनहारों ने नहीं किया। उम्मीदें ज्यादा थीं। अगर सभी ने सामूहिक प्रयास किया होता तो आज जौनपुर और माधोपट्टी सैफई की तरह चमक रहा होता। आज यहां भी हर ओर चकाचैंध होती।

ये हैं वो गांव के होनहार
सबसे पहले प्रख्यात शायर रहे वामिक जौनपुर के पिता मुस्तफा हुसैन सन 1914 पीसीएस और 1952 में इन्दू प्रकाश सिंह का आईएएस में सलेक्शन हुआ। इसके बाद तो हर घर में प्रतिस्पर्धा की बाढ़ सी आ गई। युवा खुद को साबित करने के लिए जीतोड़ मेहनत करने लगे। आईएएस बनने के बाद इन्दू प्रकाश सिंह फ्रांस सहित कई देशों में भारत के राजदूत रहे। इस गांव के चार सगे भाइयों ने आईएएस बनकर जो इतिहास रचा है वह आज भी भारत में कीर्तिमान है। इन चारों सगे भाइयों में सबसे पहले 1955 में आईएएस की परीक्षा में 13वीं रैंक प्राप्त करने वाले विनय कुमार सिंह का चयन हुआ। विनय सिंह बिहार के मुख्यसचिव पद तक पहुंचे। 1964 में उनके दो सगे भाई क्षत्रपाल सिंह और अजय कुमार सिंह एक साथ आईएएस अधिकारी बने, क्षत्रपाल तमिलनाड् के प्रमुख सचिव रहें। प्रकाश सिंह ढ्ढ्रस्, वर्तमान में उ.प्र. के सचिव नगर विकास हैं। गरिमा सिंह ढ्ढक्कस्, सोनल सिंह ढ्ढक्रस्, विनय सिंह भाई के चौथे भाई शशिकांत सिंह 1968 आईएएस अधिकारी बने। इनके परिवार में आईएएस बनने का सिलसिला यहीं नहीं थमा, 2002 में शशिकांत के बेटे यशस्वी न केवल आईएएस बने बल्‍कि परीक्षा में 31वीं रैंक हासिल की। गांव की आशा सिंह 1980, उषा सिंह 1982, कुवंर चद्रमौल सिंह 1983 और उनकी पत्नी इन्दू सिंह 1983, अमिताभ बेटे इन्दू प्रकाश सिंह 1994 आईपीएस उनकी पत्नी सरिता सिंह 1994 में आईपीएस प्रतियोगिता में चयनित हुए। पीसीएस अधिकारियों की तो इस गांव में संख्या ही मत पूछिए। राममूर्ति सिंह, विद्याप्रकाश सिंह, प्रेमचंद्र सिंह, पीसीएस महेन्द्र प्रताप सिंह, जय सिंह, प्रवीण सिंह व उनकी पत्नी पारूल सिंह, रीतू सिंह, अशोक कुमार प्रजापति, प्रकाश सिंह, राजीव सिंह, संजीव सिंह, आनंद सिंह पीसीएस हैं। 2013 के आए परीक्षा परिणाम में इस गांव की बहू शिवानी सिंह ने पीसीएस परीक्षा पास किया।


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Abhishek Srivastava
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