16 फ़रवरी 2026,

सोमवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

झाबुआ

Video news-सूखी अनास नदी के किनारे बसे 5 गांव के किसानों को रबी फसलों की सिंचाई की चिंता

5 हजार रुपए लगाकर नदी में खोदे गड्ढे , अब डैम से पानी छोड़ने की लगा रहे आस

Google source verification

झाबुआ. सूखी अनास नदी पर जगह-जगह बड़े बड़े गड्ढे बनाकर किसान रबी की फसलों की सिंचाई की जुगाड़ में जुटे हैं। इन गड्ढों के तले में जमा थोड़े से पानी को खेतों तक पहुंचाने के लिए किसान नदी पर मोटर लगाकर आधा घंटा सिंचाई कर रहे हैं। लेकिन किसान इस बात से चिंतित है कि गड्ढों में भरा पानी भी धीरे-धीरे खत्म होने लगा है। उनके खेतों में खड़ी रबी फसलों की सिंचाई के लिए पानी की किल्लत है, अब ये किसान जल संसाधन विभाग द्वारा धरमपुरी डेम से पानी छोड़ने की आस लगाए बैठे हैं। इधर ,नपा का कहना है कि डेम जलापूर्ति के लिए बना है सिंचाई के लिए नहीं , इसलिए इसमें से सिंचाई के लिए पानी नहीं छोड़ा जा सकता।

दरअसल अनास नदी पर 2021 में 110 एमसीएफटी क्षमता वाला डैम बनाने के बाद से ही पिपलिया, बड़ा सेमलिया, बामन सेमलिया, धरमपुरी, गडवाड़ा क्षेत्र के 400 से अधिक किसान रबी फसलों की सिंचाई के लिए चिंतित है। उनके खेतों में लगी गेंहू मक्का चना की फसल सिंचाई के अभाव में सूखने कि कगार पर है। नदी के आसपास बसे गांवों के किसानों ने 5 हजार रूपए खर्च कर पोकलेन मशीन से नदी में थोड़ी थोड़ी दूर गड्ढे खोदे थे। सिंचाई के पानी की जुगाड़ में खोदे अधिकांश गड्ढों में पानी नहीं है। पैसा खर्च करने के बाद भी किसान फसलों की सिंचाई की चिंता में डूबे हैं।

किसानों की पीड़ा – पिपलिया , सेमलिया , बामन सेमलिया , गडवाड़ा, धरमपुरी , नाचन खेड़ा गांव के किसान कमल सिंह वसुनिया, थावरिया भिला, हकरिया भीला, पार सिंह मुंशी, गुड़ा नरू डामोर, नान सिंह भूरिया , झितरा भूरिया, बाबू वसुनिया, दिलीप मेड़ा, नान सिंह मेड़ा, रतन मंडोड , किलू मंडोड़ , पानू भूरिया बदिया पूनिया, धन्नू मंडोड एवं कन्नू मंडोड ने बताया कि अनास नदी पर बड़ा डेम बनने के बाद उनके गांवों में पिछले 3 सालों से रबी की फसल की सिंचाई नहीं हो रही है, किसान खेतों में खड़ी फसलों को सूखते हुए देख रहा है। यह पीड़ा असहनीय है। इसे दूर करने किसानों को जनवरी-फरवरी माह में धरमपुरी डैम का एक गेट खोलकर किसानों को पानी पहुंचाने की जरूरत है। इसके लिए विधायक सांसद, कलेक्टर , जल संसाधन विभाग हर जिम्मेदार के कार्यालय के चक्कर लगाएं हैं, लेकिन समस्या दूर नहीं हुई।
मवेशियों के पीने के लिए नहीं रहता पानी –
अन सिंह भाबर, तोलू वसुनिया, बुलू वसुनिया, रमेश डामोर, खुनू डामोर, खारू मेडा, भुर सिंह मेडा का कहना है कि गर्मी के आने से पहले ही नदी सूख जाती है। इस कारण मवेशियों को गर्मी में पानी पिलाने के लिए समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। मवेशियों के साथ तपती धूप में कई किलोमीटर दूर जाने के बाद पानी नसीब होता है। हमारे मवेशियों के पीने के लिए भी नदी में पानी नहीं है।

कुआं ही सहारा –

एक कुआं खोदने में 15 हजार खर्च होता है। यदि फसलों की सिंचाई की जुगाड नहीं की तो फसल सूखने का डर लगता है। इसलिए दो से तीन किसान मिलकर गड्ढे खुदवा रहे हैं। किसानों का यही एक सहारा है। यह गड्ढे आकार में कम होने के कारण 3 से 4 दिनों में आधे भरते है। इससे 2 दिन में एक बार सिंचाई की जाती है। कभी कभी सिंचाई के बाद 3 से 4 दिन पानी भरने में लगते है ,इसलिए सिंचाई के लिए भी इंतजार करना पड़ता है ।

बांध बनने के बाद बदल गए हालात
पहले गर्मियों से पहले अनास बैराज में पानी की मात्रा कम होने पर धमोई और गुलाबपुरा तालाब से पानी छोड़ा जाता था। इससे रास्ते में आनेवाले गांव के किसान मोटर लगाकर सिंचाई कर लेते थे, कई बार मोटर जब्त करने की कार्रवाई भी हुई। लेकिन पिछले 3 सालों से धरमपुरी डेम बनने के बाद अधिकतर गांव में नदी सुखी रहने लगी है। इससे किसान गड्ढे खुदवा रहे हैं। हालांकि यह बांध पेयजल आपूर्ति के लिए बनाया है, लेकिन अब सेमलिया छोटा , मकन कुई, पिथनपुर जैसे गांव के किसानों को पर्याप्त पानी मिल रहा है।

किशनपुरी बांध –
अनास नदी पर किशनपुरी क्षेत्र में 1971 में 25 करोड़ लीटर क्षमता वाला बांध बनाया गया था। जिसने 50 साल तक नगर में जलप्रदाय किया। यह डैम आबादी बढ़ने के बाद शहर की जलापूर्ति करने के लिए छोटा पड़ने लगा था। इसके बाद नया और अधिक क्षमता वाला डैम बनाने की जरूरत महसूस होने लगी। 2021 में 111 एमसीएफटी क्षमता वाला बैराज धरमपुरी में बनकर तैयार हुआ। यह बांध 17 मीटर ऊंचा और 130 मीटर चौड़ा है। यहां हर दिन 90 लाख लीटर पानी फिल्टर हो सकता है। जो शहर कि जरूरत के मुताबिक है।

जलापूर्ति के लिए बना है –

यह डैम नगर की 60 हजार जनता की जल आपूर्ति के लिए बनाया है। यह सिंचाई के लिए नहीं बना है। इसलिए इससे किसानों के लिए पानी नहीं छोड़ा जा सकता।
धीरेन्द्र रावत, मुख्य इंजीनियर, नगरपालिका, झाबुआ