सुबह 9 बजे से बावन जिनालय की नई धर्मशाला में प्रवचनों का सिलसिला शुरू हुआ। सर्वप्रथम गुरूवंदन की विधि श्रावकरत्न धर्मचंद्र मेहता ने संपन्न करवाई। इसके बाद रजतचंद्र विजय एवं जिनचंद्र विजय ने शंखेश्वर पाश्र्वनाथ भगवान के मधुर स्तवनों की प्रस्तुति देकर प्रवचनों की शुरुआत की। मुनि रजतचंद्र विजय ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि देव एवं गुरु की आराधना से हम अपनी आत्मा को सुखी बना सकते हैं। संसार में यदि कोई भी बाधा आती है, तो उन्हें जिनवाणी से दूर करना चाहिए। हम अपने शरीर को संसार के अनेक भौतिक संसाधनों से सुखी बनाने का प्रयास करते रहते हंै, लेकिन शरीर को सुखी करने के लिए धर्म और प्रार्थना जरूरी है। आत्मा की शुद्ध परमात्मा के ध्यान से ही संभव है। जीवन में धर्म का होना जरूरी है। श्रद्धा परम् र्दुलभ तत्व है। तप त्याग से मीठा लगता है। जीवन में धर्म का होना जरूरी है। धर्म से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। नशाखोरी करने वाला व्यक्ति भी यदि धर्म को थोड़ा सा भी मान ले और धर्म के नियमों का पालन करेे तो उनका जीवन भी सुधर सकता है।