सावन का पहला सोमवार , शिवालयों में गूंजेगा हर हर महादेव -देवल फलिया 12 वीं सदी में , भगोर मंदिर 11वीं सदी में निर्मित किया गया था- यह शिवालय तीर्थ स्थल की तरह पवित्र माने जाते हैं
झाबुआ. सावन के पहले सोमवार पर शिवालयों में भक्त देवाधीदेव महादेव के दर्शन को पहुंचेंगे। जिले में अनेकों शिव मंदिर हैं , लेकिन प्राचीन शिव मंदिरों में शुमार तीन मंदिर देवझिरी , देवल फलिया और भगोर शिवालय भक्तों के विशेष आस्था का केंद्र है। यह मंदिर जितने पुराने हैं उतनी ही किवदंतियां मंदिरों के साथ जुड़ी हुई है। ये किवदंतियां ही भक्तों को इन शिवालय में खींच लाती है। तीनों देवस्थान की खास बात यह है कि प्राचीन होने के साथ ही यह शिवालय तीर्थ स्थल की तरह पवित्र माने जाते हैं , यहां सावन माह और शिवरात्रि पर हजारों लोग माथा टेकने पहुंचते हैं।
1. देवझिरी तीर्थ स्थल
संत सिंगाजी महाराज की तपोभूमि देव झिरी तीर्थ स्थल जिले का सबसे प्रमुख देवस्थान है ,जो पर्यटन स्थल भी है। यहां वर्षों से मां नर्मदा की सतत जलधारा बैठी रहती है। प्राचीन मंदिर को लेकर किवदंती है कि यहां किसी जमाने में संत सिंगाजी तप किया करते थे और वे अपने तपोबल से रोजाना नर्मदा के दर्शन और स्नान के लिए नर्मदा तट पर जाया करते थे। इस स्थान से नर्मदाजी की दूरी लगभग 90 किलोमीटर है। संत सिंगाजी बुजुर्ग अवस्था में भी अपने संकल्प से नहीं डिगे , लेकिन अपने अंतिम समय में उन्होंने अपनी इस अवस्था का हवाला देकर मां नर्मदा से प्रार्थना की कि अब वे चलने में असमर्थ हैं , वे प्रतिदिन स्नान एवं मां नर्मदा के दर्शन के लिए नहीं आ सकेंगे, उन्होंने मां नर्मदा से प्रार्थना की कि वे उनकी तपस्थली देवझिरी में प्रकट हों । मां ने उनकी प्रार्थना सुन ली और उसी दिन से देवझिरी में नर्मदा की गुप्त जलधारा बहने लगी। यहां पर भोलेनाथ के प्राचीन मंदिर के पास संत सिंगाजी का भी मंदिर बनाया गया है।
-देवल फलिया शिव मंदिर
राणापुर से 12 किमी दूर स्थित देवल फलिया में प्राचीन शिव मंदिर है। कहा जाता है कि यह शिव मंदिर 12 वीं सदी में स्थापित किया गया था। मंदिर की स्थापत्य कला भी दर्शनीय है। मंदिर में दुर्लभ पंचमुखी शिवलिंग स्थापित है। गर्भ ग्रह अंतराल मंडप युक्त था।मंदिर में भगवान विष्णु एवं अन्य देवताओं की भी मूर्तियां स्थापित की गई है। यह मंदिर भूमिज शैली के पंचरथी पंचांग प्रकार से निर्मित है।इसकी शैली को देखते हुए पुरातत्व विभाग इसे एक 11 वीं या 12 वीं सदी में निर्मित हुआ मानता है। वक्त के साथ मंदिर का बहुत सा हिस्सा क्षतिग्रस्त हो चुका है, मंदिर का शिखर को कुछ समय पहले संरक्षित करने का प्रयास किया गया था। माना जाता है कि मंदिर को कोई यति महाराज उड़ा कर लाए थे। यूं तो महाशिवरात्रि और सावन सोमवार पर यहां मेले का वातावरण निर्मित हो जाता है, लेकिन आम दिनों में भी यहां लोग परिवार के साथ पिकनिक मनाने पहुंचते हैं।
-भगोर शिव मंदिर
मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर स्थित एक छोटा सा गांव भगोर, जहां बिखरे पड़े हैं जिले के सबसे प्राचीन मंदिर के भग्नावशेष। यह मंदिर गांव की प्राचीनता की गवाही देता है। माना जाता है कि मंदिर 11वीं सदी में निर्मित किया गया था। भगोर शिव मंदिर कितना प्राचीन है यह तो कोई नहीं जानता ,लेकिन मंदिर की वर्तमान स्थिति को देखते हुए सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि जिले के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक भगोर का शिव मंदिर रहा है। यह मंदिर पूरी तरह से जर्जर हो चुका है। मंदिर में भगवान शिव और माता पार्वती की मूर्ति स्थापित की गई है। किवदंती के अनुसार इसे भ्रीगू ऋषि की तपोस्थली भी माना जाता है। इस मंदिर की ना तो कभी प्रशासन ने सुध ली न ही पुरातत्व विभाग ने कोई सरोकार रखा। नतीजा यह है कि मंदिर के अवशेष इधर-उधर बिखरे पड़े हैं।