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‘हम भी कभी उफनता हुआ ज्वार थे, आजकल भाटा हो गए’

अभा साहित्य परिषद् के बैनर तले ऑनलाइन कवि सम्मेलन का आयोजन

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‘हम भी कभी उफनता हुआ ज्वार थे, आजकल भाटा हो गए’

‘हम भी कभी उफनता हुआ ज्वार थे, आजकल भाटा हो गए’

झाबुआ. अखिल भारतीय साहित्य परिषद् की जिला इकाई के तत्वावधान में विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर परिषद के प्रांताध्यक्ष त्रिपुरारीलाल शर्मा के मार्गदर्शन में ऑनलाइन कवि सम्मेलन आयोजित किया गया। सम्मेलन में कोरोना एवं पर्यावरण को दृष्टिगत रखते हुए ‘एक शाम कोरोना के नाम’ विषय पर आयोजित हुआ।

कवि ब्रजकिशोर पटेल इटारसी के मुख्य आतिथ्य एवं हिन्दी के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. रामशंकर चंचल की अध्यक्षता में मां शारदा साहित्य समूह पर आयोजित किया गया। आयोजक अभा साहित्य परिषद के जिलाध्यक्ष भेरूसिंह चौहान तरंग थे। प्रारंभ में मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण कर दीप प्रज्वलित किया गया। सरस्वती वंदना ब्रजकिशोर पटेल ने प्रस्तुत करते हुए ‘हम भी कभी उफ नता हुआ ज्वार थे, आजकल भाटा हो गए और जब ससुरा कोरोना वायरस बूढ़ों पर ज्यादा अटेक करता है, सुनकर कांटा हो गए, के साथ ही कई रचनाएं सुनाई। उक्त प्रस्तुति ने श्रोताओं की खूब दाद बटोरी। अतुल देशमुख ने व्यथित पेड़ों की पीढ़़ा को व्यक्त किया। डॉ. गीता दुबे ने ‘पेड़ कटा, घोंसला गिरा ,बेघर हो गई चिडिय़ा, ची-ची करती, शोर मचाती, घर में घुस आई है चिडिय़ा’। भेरूसिंह चौहान ‘तरंग’ ने ‘कोरोना से जंग लड़ेंगे, उसको आज भगाएंगे, हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई मिलकर साथ निभाएंगे, गीत की प्रस्तुति दी और वाहवाही बंटोरी।
रोटी पाने की चाह में देश-विदेश भटका
डॉ. अंजना मुवेल ने ‘रोटी तुझे पाने के चाह में देश-विदेश भटका बहुत, तुझे पाने की चाह में घर छोड़ा’। रत्नदीप खरे ने ‘ये मस्जिद जरूरी है, न वो मंदिर जरूरी है, किसी बेघर का बन जाए कहीं घर जरूरी है। डॉ. रामशंकर चंचल ने अपनी लघु कथा प्रस्तुत की। जिसे काफ ी सराहा गया। मकनसिंह खपेड एवं डॉ. अर्चना राठौर ने कोराना वायरस को लेकर बहुत ही सुंदर रचना प्रस्तुत की।