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रकबा बढ़ा, पर भाव नहीं: किसानों को लहसुन प्रोसेसिंग यूनिट का इंतजार

जिले में 32 हजार हैक्टेयर में हुई लहसुन की बुवाई झालावाड़ प्रदेश में लहसुन उत्पादन में झालावाड़ जिला दूसरे स्थान पर है। हर वर्ष किसान बेहतर मुनाफे की उम्मीद के साथ लहसुन की बुवाई करते हैं, लेकिन अधिकांश समय उन्हें उम्मीद के अनुरूप भाव नहीं मिल पाता। इसके बावजूद अन्य फसलों की तुलना में लहसुन […]

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जिले में 32 हजार हैक्टेयर में हुई लहसुन की बुवाई

झालावाड़ प्रदेश में लहसुन उत्पादन में झालावाड़ जिला दूसरे स्थान पर है। हर वर्ष किसान बेहतर मुनाफे की उम्मीद के साथ लहसुन की बुवाई करते हैं, लेकिन अधिकांश समय उन्हें उम्मीद के अनुरूप भाव नहीं मिल पाता। इसके बावजूद अन्य फसलों की तुलना में लहसुन का उत्पादन अधिक लाभकारी होने के कारण जिले में इसका रकबा लगातार बढ़ रहा है।

वर्ष 2024-25 में जिले में लहसुन का रकबा 24 हजार 666 हैक्टेयर था, जो 2025-26 में बढ़कर करीब 32 हजार हैक्टेयर हो गया है। पिछले वर्ष लहसुन के भाव 120 रुपये प्रति किलो तक पहुंचे थे, जिससे किसानों का रुझान इस फसल की ओर और बढ़ा। हालांकि इस वर्ष बाजार में भावों में अपेक्षित उछाल नहीं आने से किसानों की चिंता बढ़ गई है। किसानों का कहना है कि यदि स्थानीय स्तर पर लहसुन से जुड़ी प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित की जाए, तो उन्हें उपज का बेहतर मूल्य मिल सकता है।

खुले बाजार में नहीं मिल रहे अच्छे भाव

वर्ष 2024 के अंत से ही लहसुन के भावों में गिरावट शुरू हो गई थी, जो 2025 में नई फसल की आवक के बाद भी नहीं संभल पाए। शुरुआती दौर में कुछ बड़े किसानों ने बेहतर भाव की उम्मीद में माल रोककर रखा, लेकिन अब तक कीमतों में सुधार नहीं हुआ है।
वर्तमान में खुले बाजार में बॉक्स क्वालिटी लहसुन के भाव अधिकतम 5 से 7 हजार रुपये प्रति क्विंटल तक सीमित हैं, जबकि लॉट क्वालिटी के भाव 1600 से 2400 रुपये प्रति 100 किलो तक आ चुके हैं।

लहसुन उत्पादक किसानों को वर्ष 2022 और 2023 में ही व्यापक तेजी देखने को मिली थी। वर्ष 2022 में बॉक्स क्वालिटी लहसुन 35 से 38 हजार रुपये प्रति 100 किलो तक बिका था, जबकि 2023 में यह 50 हजार रुपये प्रति 100 किलो के उच्चतम स्तर तक पहुंच गया था। इसके बाद 2024-25 के अंत से लगातार गिरावट जारी है।

जिले से देश-विदेश तक निर्यात

जिले में उत्पादित अधिकांश लहसुन की ग्रेडिंग कर व्यापारी इसे बाहर के बाजारों में भेजते हैं। झालावाड़ का लहसुन तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, बिहार (गुलाबबाग), दिल्ली, उत्तर प्रदेश, असम सहित राजस्थान के विभिन्न जिलों में जाता है। इसके अलावा खाड़ी देशों में भी इसका निर्यात किया जाता है।

90 फीसदी लहसुन खाने में होता है उपयोग

विशेषज्ञों के अनुसार जिले में उत्पादित लहसुन का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा खाने में उपयोग होता है, जबकि केवल 10 प्रतिशत दवाइयों के निर्माण में काम आता है। बिहार के गुलाबबाग मंडी में प्रतिदिन करीब एक लाख बोरी लहसुन की बिक्री भोजन उपयोग के लिए होती है।

चाइना के लहसुन पर रोक की मांग

किसानों का कहना है कि सरकार को चीन से आयात होने वाले लहसुन पर रोक लगानी चाहिए। जब भी किसानों को अच्छे भाव मिलने की संभावना बनती है, विदेशी लहसुन का आयात शुरू हो जाता है, जिससे घरेलू बाजार में कीमतें गिर जाती हैं और किसानों को नुकसान उठाना पड़ता है।

स्थानीय स्तर पर प्रोसेसिंग इकाई की जरूरत

किसानों का कहना है कि हाड़ौती अंचल में सबसे अधिक लहसुन उत्पादन झालावाड़ जिले में होता है। इस बार 32 हजार हैक्टेयर में बुवाई हुई है। ऐसे में यदि जिले में लहसुन पेस्ट और पाउडर बनाने की प्रोसेसिंग इकाइयां स्थापित की जाएं, तो किसानों को बेहतर दाम मिलेंगे और युवाओं को रोजगार भी मिलेगा।


फैक्ट फाइल : झालावाड़ लहसुन

इस वर्ष लहसुन की बुवाई : 32,501 हैक्टेयर

पिछले वर्ष लहसुन की बुवाई : 24,666 हैक्टेयर

पिछले 5 वर्षों का औसत उत्पादन : 5007.20 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर

जिले में लहसुन के बेहतर उत्पादन और अनुकूल जलवायु परिस्थितियों को देखते हुए इसे एक्सपोर्ट-उन्मुख फसल के रूप में विकसित करने पर जोर दिया जाना चाहिए। उत्पादन के साथ-साथ गुणवत्ता, प्रसंस्करण और मार्केटिंग पर भी समान ध्यान दिया जाए तो जिले का लहसुन अंतरराष्ट्रीय बाजार में मजबूत पहचान बना सकता है। जिले में उगाया जाने वाला लहसुन आकार, सफेदी और तीखापन के लिहाज से निर्यात योग्य है। आवश्यकता इस बात की है कि किसानों को एक्सपोर्ट ग्रेड किस्मों की ओर प्रोत्साहित किया जाएं और क्लस्टर आधारित खेती को बढ़ावा दिया जाए। जिससे एकरूप गुणवत्ता का उत्पादन संभव हो सके। इसके साथ ही कटाई के बाद क्योरिंग, ग्रेडिंग और वैज्ञानिक भंडारण की व्यवस्था मजबूत करनी होगी। यदि जिले में पैक हाउस, कोल्ड स्टोरेज और लहसुन डिहाइड्रेशन यूनिट स्थापित की जाती हैं, तो किसानों को बेहतर दाम मिल सकते हैं।

डॉ. चौथमल शर्मा, कृषि अधिकारी, झालावाड़


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