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दीवाली पर गढ़ पेलेस की भव्यता देखने को मिलती थी शहरवासियों को

-तोप की गूंज से होता था दीपोत्सव का आगाज-बुर्जुगों की आंखों में तैरता है रियासतकालीन खूबसूरत मंजर

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On Diwali, the grandeur of the fortress palace was seen by the citizen

दीवाली पर गढ़ पेलेस की भव्यता देखने को मिलती थी शहरवासियों को

दीवाली पर गढ़ पेलेस की भव्यता देखने को मिलती थी शहरवासियों को
-तोप की गूंज से होता था दीपोत्सव का आगाज
-बुर्जुगों की आंखों में तैरता है रियासतकालीन खूबसूरत मंजर
-जितेंद्र जैकी-
झालावाड़. दीवाली पर रियासतकाल में शहरवासियों को राजपरिवार के निकट पहुंचने का मौका मिलता था। राजपरिवार के लोग भी शहरवासियों से आत्मियता से मिलते व दीवाली की शुभकामनाएं देते थे। उस समय सभी धर्म के लोग भाईचारें के रुप में दीवाली मनाते थे। गरीब लोगों के घर अलसी के तेल से व धनाढ्य लोगों के घरो में तिल्ली व घी के दीपक जलते थे। शुद्व देशी घी से बनी मिठाईयां बंटती थी। रियायतकाल में शहर में दीपोत्सव का आगाज तोप की गूंज के साथ होता था। दीवाली पर नगर के हद्य स्थल पर स्थित गढ़ भवन पेलेस के द्वार जनता के लिए खोल दिए जाते थे। गढ़ भवन का स्वर्णिम और वैभवयुक्त राजशाही नजारा जनता को देखने को मिलता था। नरेश जनता के बीच जाकर दीवाली मनाते। रियासतकालीन दीवाली की मधुर स्मृतियों को संजाएं बैठे शहर के बुर्जुगवारों ने पत्रिका के साथ सांझा की अपनी यादें.....हालाकि पहले संयुक्त परिवार के साथ रहते हुए दीवाली मनाने का आनंद उनके झुर्रीदार चेहरे से झलका, लेकिन वर्तमान में एकांकी व सीमित परिवार की टीस भी उनके दिल में उभरती हुए महसूस की गई।
-गढ़ भवन में पूजा करने जाता था
शहर के 91 वर्षीय गोरधनलाल व्यास ने बताया कि रियासतकाल में दिवाली पर गढ़ भवन में विशेष सजावट होती थी। इसे आमजन के लिए खोला जाता था। नरेश आम लोगों से मिलते व उन्हे दीवाली की शुभकामनाएं देते थे। दरीखाना सजता था। शहरवासी कमरपट्टा बांधते व नये धोती कुर्ता व अन्य कपड़े पहन कर गढ़ भवन देखने जाते थे। पूजा अर्चना के बाद गढ़ भवन की भव्यता व सौंदर्य को अंदर से देखते के लिए आमजन को प्रवेश दिया जाता था। व्यास ने बताया कि दीवाली पर वह कोठी व गढ़ भवन में राज परिवार की ओर से महालक्ष्मी की पूजा करते थे।
-सार्वजनिक रुप से होता था मनोरंजन
शहर के 89 वर्षीय बाबूराम आर्य ने बताया कि दीवाली पर शहर में अधिकतर लोग परिवार के साथ आनंद उठाते थे। संयुक्त परिवार में सबसे ज्यादा फुलझड़ी चलाई जाती थी। इसमें परिवार के सभी सदस्य भाग लेते थे। इसी तरह गोरधन पूजा के दिन भी पशुओं को सजाने व दीवाली मनाते थे। संयुक्त परिवार के साथ त्यौहार मनाने का आनंद आता था। दीवाली पर पुरुषों के मनोरंजन के लिए सार्वजनिक रुप से कालेबाबू की हवेली क्षेत्र में चौसर जमती थी।
-दरबार की सवारी देखने उमड़ते थे लोग
शहर के 90 वर्षीय मोहनलाल गुप्ता ने बताया कि दीवाली पर कोठी से गढ़ भवन तक दरबार बग्गी में सवार होकर निकलते थे। उस दौरान सड़क किनारे स्थित दुकानों व मकानों पर दीपक से रोशनी की जाती थी। मंगलपुरा चौराहे से गढ़ के दरवाजे तक दोनो ओर स्थित मकानों के झरोखों पर दीपक व मोमबत्तियां जला कर विशेष रोशनी की जाती थी। इस दौरान लोग सवारी देखने के लिए उमड़ जाते थे।
-तोप से होता था दिवाली का स्वागत
इतिहासकार ललित शर्मा ने बताया कि दीपावली के दिन उस युग में गंावड़ी के तालाब के किनारे चांदमारी में राज्य की ओर से तोपखाने की गर्जना वाली तोपें चलाई जाती थी जो दिपावली के स्वागत का प्रतीक होती थी। गढ़ भवन में गढड्े खोद कर उनमें बांस लगाये जाते थे। बांसों पर मिट्टी के दीपकों की कतार को बड़ी कुशलता से सजाया जाता था। उसमें दीवाली की रात तेल डाल कर जलाया जाता। दीपकों की सुनहरी रोशनी में गढ़ भवन अयोध्या के राजमहल के समान स्वर्णिम और वैभवयुक्त हो उठता था। उस समय भवन के सुंदर व आलीशान विशाल कक्षों को आमजन के अवलोकनार्थ खोला जाता था। उनमें सजी शाही व बहुमूल्यवान कलाकृतियों शस्त्रों आदि का आमजन परिवार सहित अवलोकन करते थे।