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नारंगी से महकी सुनेल की धरती, देशभर में फैली मिठास

उत्पादन कम, पर दाम मजबूत: जैविक खेती और आधुनिक तकनीक से किसानों को लाखों का लाभ

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उत्पादन कम, पर दाम मजबूत: जैविक खेती और आधुनिक तकनीक से किसानों को लाखों का लाभ

झालावाड/ सुनेल. क्षेत्र में इस बार गर्मियों में नारंगी के भावों में तेजी से किसानों के चेहरे खिले हैं। उत्पादन में कमी से बाजार में आवक घटी है, लेकिन बढ़े दामों का सीधा फायदा किसानों को मिल रहा है।

किसान रॉयल पाटीदार ने बताया कि यदि आने वाले दिनों में आवक और घटती है तो भाव में और तेजी संभव है। उन्होंने बताया कि महाराष्ट्र में मानसून पहले आने से वहां उत्पादन एक माह पहले शुरू हो जाता है, जबकि राजस्थान में मानसून की देरी के कारण सीजन देर तक चलता है। यहां की नारंगी को लगभग एक महीने तक स्टोर भी किया जा सकता है।

देशभर में पहचान

सुनेल क्षेत्र की नारंगी की मांग देशभर के साथ विदेशों तक पहुंच रही है। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, बिहार, दिल्ली और अलीगढ़ सहित कई राज्यों के व्यापारी सीधे खेतों से ही खरीद कर माल ले जाते हैं। यहां की मिट्टी और जलवायु नारंगी की खेती के लिए बेहद अनुकूल है। पौधा लगाने के लगभग पांच वर्ष बाद पेड़ पर फल आना शुरू हो जाता है।

तीन पीढ़ियों की मेहनत से बना मॉडल फार्म

क्षेत्र के सिन्दूरिया गांव में वर्ष 1964 में पूर्व सरपंच कन्हैयालाल पाटीदार ने 300 पौधे लगाकर नारंगी बागवानी की शुरुआत की थी। बाद में पुत्र अशोक और नवीन पाटीदार ने इसे आगे बढ़ाया। तीसरी पीढ़ी में रॉयल पाटीदार ने खेती की कमान संभालते हुए 25 एकड़ भूमि में लगभग 3000 पौधे लगाकर आधुनिक तकनीकों से उत्पादन को नई ऊंचाई दी। वर्तमान में वे नारंगी से लाखों रुपए की आय अर्जित कर रहे हैं।

आधुनिक तकनीक और जैविक खेती

रॉयल ने सीसीआई नागपुर के वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में ‘आलिमोरूटस्टॉकमाइक्रोबडिंग’ तकनीक के पौधे लगाए हैं। यह तकनीक वर्ष 2014 में भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा अमेरिका के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से लाई गई थी और सात वर्षों के परीक्षण के बाद इसे नारंगी उत्पादन का भविष्य माना गया। इस रूटस्टॉक से पौधे अधिक स्वस्थ, रोग प्रतिरोधक और दीर्घकालिक उत्पादन देने वाले साबित हो रहे हैं।

जैविक बैक्टीरिया आधारित खेती

उन्होंने पूरी तरह जैविक बैक्टीरिया आधारित खेती अपनाई है। माइकोराइजा, ट्राइकोडर्मा, एनपीके कल्चर बैक्टीरिया, फूड ग्रेड जैविक कीटनाशक, कवच तथा जैविक फंगीसाइड(ब्यूवेरियाबैसियाना) का नियमित उपयोग किया जा रहा है। इसका सकारात्मक असर यह हुआ कि बिना केंचुआ डाले ही खेत में केंचुओं की संख्या बढ़ गई, मिट्टी की उर्वरता में सुधार हुआ और कीटनाशकों पर होने वाला खर्च लगभग समाप्त हो गया। एक पेड़ से लगभग डेढ़ क्विंटल तक उत्पादन हो जाता है। वर्तमान में नारंगी 55 से 60 रुपए प्रति किलो बिक रही है तथा एक कैरेट की कीमत करीब 1000 रुपए तक पहुंच रही है।

सैकड़ों मजदूरों को मिल रहा रोजगार

नारंगी कारोबार के कारण क्षेत्र में पैकिंग व्यवसाय भी फल-फूल रहा है। महाराष्ट्र से हर वर्ष 500 से 1000 श्रमिक पैकिंग कार्य के लिए यहां आते हैं। सुनेल सहित सिरपोई, सिन्दूरिया और ढाबलाखींची गांवों में सैकड़ों श्रमिक डेरा डालकर दिन-रात पैकिंग कार्य में जुटे रहते हैं। एक मजदूर को प्रतिमाह लगभग 20 से 25 हजार रुपए तक मजदूरी मिलती है। इसमें बाग से फल तोड़ने से लेकर कैरेट में पैकिंग और गाड़ियों में लोडिंग तक का कार्य शामिल रहता है।

इस वर्ष जिले में 24 हजार 500 हैक्टेयर क्षेत्र में संतरा और नारंगी के बगीचे हैं। लगातार बारिश और नमी के कारण काली मस्सी व फंगस रोग से उत्पादन प्रभावित हुआ है, लेकिन बाजार में किसानों को अच्छे भाव मिल रहे हैं। किसानों का जैविक बागवानी की ओर रुझान भी बढ़ा है।

सुभाषचंद शर्मा, उपनिदेशक, उद्यान विभाग