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Jhunjhununews : प्रागैतिहासिक औजारों का बड़ा केंद्र मिला, मिले पत्थर के टूल्स; फैक्टरी साइट के संकेत

रीढ़ के टीले के ऐतिहासिक महत्व को लेकर राजस्थान पत्रिका में खबर प्रकाशित होने के बाद पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग की टीम ने स्थल का सर्वेक्षण किया और वैज्ञानिक तरीके से उत्खनन शुरू किया। अब खुदाई और सर्वेक्षण में मंदिर स्थापत्य के अवशेष, मूर्तियों के खंड, मृद्भांड और प्रागैतिहासिक पत्थर के औजार मिलने से यह साफ हो गया है कि यह स्थल ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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झुंझुनूं जिले के खेतड़ी क्षेत्र में स्थित त्योंदा गांव के पास रीढ़ का टीला (रैड़ा) एक बार फिर चर्चा में है। यहां चल रहे पुरातात्विक उत्खनन और सर्वेक्षण में प्रागैतिहासिक काल के पत्थर के औजारों की बड़ी संख्या मिलने से संकेत मिले हैं कि यह क्षेत्र प्राचीन समय में औजार निर्माण का प्रमुख केंद्र यानी ‘फैक्टरीसाइट’ रहा होगा। राजस्थान राज्य पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग की टीम द्वारा वैज्ञानिक पद्धति से किए जा रहे उत्खनन और आसपास के सर्वेक्षण में पहाड़ीढलानों और कंकरीली सतहों पर पत्थर के औजार, कोर और फ्लेक बड़ी मात्रा में मिले हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रागैतिहासिक मानव यहां स्थानीय पत्थरों से औजार बनाते थे और यहीं उनका निर्माण कार्य होता था।

पहाड़ीढलानों पर मिले चॉपर और फ्लेक औजार

पुरातत्व विभाग की टीम ने रीढ़ के टीले के साथ आसपास के इलाके का भी विस्तृत सर्वेक्षण किया। इस दौरान पहाड़ीढलानों पर चॉपर, फ्लेक औजार, कोर और आंशिक रूप से तैयार उपकरण मिले हैं। ये औजार मुख्य रूप से स्थानीय क्वार्ट्जाइट और अन्य कठोर पत्थरों से बने प्रतीत होते हैं। इसके साथ ही बड़ी संख्या में पत्थर के छोटे-छोटे टुकड़े भी मिले हैं, जिन्हें औजार बनाने की प्रक्रिया के दौरान निकला अवशेष माना जा रहा है। इस तरह के अवशेष यह संकेत देते हैं कि यहां प्रागैतिहासिक मानव समूह पत्थर के कच्चे पदार्थ को एकत्र कर उसी स्थान पर औजार तैयार करते थे।

मंदिर स्थापत्य के अवशेष भी मिले

उत्खनन के दौरान स्थल से मंदिर स्थापत्य से जुड़े कई महत्वपूर्ण अवशेष भी मिले हैं। इनमें नक्काशीदार पत्थर के स्तंभ खंड, द्वार चौखट के हिस्से, अलंकरणयुक्त पत्थर के ब्लॉक और अन्य स्थापत्य अवयव शामिल हैं। इसके अलावा पत्थर की खंडित मूर्तियां भी मिली हैं, जिनमें देवी लक्ष्मी और भगवान गणेश की प्रतिमाओं के अवशेष विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। पुरातत्वविदों के अनुसार इन प्रतिमाओं की शैली के आधार पर इन्हें लगभग 11वीं से 12वीं शताब्दी का माना जा रहा है, जिससे यहां किसी भव्य मंदिर या धार्मिक परिसर के होने के संकेत मिलते हैं।

मिट्टी के बर्तनों के अवशेष भी मिले

खुदाई में बड़ी मात्रा में मृद्भांडों के टुकड़े भी प्राप्त हुए हैं। इनमें लाल रंग के चाक से बने बर्तन प्रमुख हैं। इनमें घड़े, कटोरे, हांडी और भंडारण पात्रों के अवशेष शामिल हैं। कुछ बर्तनों पर काले रंग से ज्यामितीय आकृतियां और अलंकरण भी बने मिले हैं, जिससे उस समय की घरेलू गतिविधियों और भोजन भंडारण की परंपराओं की जानकारी मिलती है।

धातु के उपकरणों के अवशेष

उत्खनन के दौरान टेराकोटा वस्तुएं और धातु के उपकरण भी मिले हैं। इनमें लौह की कीलें, क्लैम्प, औजारों के टुकड़े और तांबे के छोटे अवशेष शामिल हैं। ये अवशेष उस समय के निर्माण कार्य और तकनीकी ज्ञान की झलक देते हैं।

प्रागैतिहासिक से मध्यकाल तक गतिविधियों के संकेत

पुरातत्वविदों के अनुसार अरावली पर्वतमाला के निकट होने के कारण यह क्षेत्र प्राचीन मानव के लिए अनुकूल रहा होगा। यहां मिले पुरावशेष संकेत देते हैं कि यह स्थान प्रागैतिहासिक काल से लेकर प्रारंभिक मध्यकाल तक मानव बसावट, धार्मिक गतिविधियों और निर्माण कार्यों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। पुरातत्व विभाग का कहना है कि क्षेत्र में आगे भी विस्तृत सर्वेक्षण और वैज्ञानिक उत्खनन जारी रहेगा। विशेषज्ञों को उम्मीद है कि भविष्य में यहां से और भी महत्वपूर्ण पुरातात्विक साक्ष्य सामने आ सकते हैं, जो शेखावाटी क्षेत्र के प्राचीन इतिहास को समझने में मदद करेंगे।

पत्रिका की खबर के बाद शुरू हुआ उत्खनन

रीढ़ के टीले के ऐतिहासिक महत्व को लेकर राजस्थान पत्रिका में खबर प्रकाशित होने के बाद पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग की टीम ने स्थल का सर्वेक्षण किया और वैज्ञानिक तरीके से उत्खनन शुरू किया। अब खुदाई और सर्वेक्षण में मंदिर स्थापत्य के अवशेष, मूर्तियों के खंड, मृद्भांड और प्रागैतिहासिक पत्थर के औजार मिलने से यह साफ हो गया है कि यह स्थल ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। विशेषज्ञों का मानना है कि आगे के अध्ययन में यहां से और भी महत्वपूर्ण साक्ष्य सामने आ सकते हैं।