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मथानिया की तरह प्रसिद्ध हो रही यहां की देसी मिर्च, लाखों रुपए कमा रहे किसान

मथानिया की तरह ही झुंझुनूं के गांवों की देसी मिर्च की मांग भी तेजी से बढ़ती जा रही है।

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पचलंगी (झुंझुनूं)। मथानिया की तरह ही झुंझुनूं के गांवों की देसी मिर्च की मांग भी तेजी से बढ़ती जा रही है। उदयपुरवाटी उपखण्ड मुख्यालय व आस-पास के गांवों के साथ चिराना, पणिहारावास जहाज, राजीवपुरा, मणकसास, जगदीशपुरा, कोट, सकराय, खेतड़ी, नवलगढ़, करमाड़ी सहित अन्य गांवों में भी बड़े पैमाने पर देसी मिर्च की खेती हो रही है।

मिर्च की खेती करने वाले जगदीशपुरा गांव के किसान रविंद्र सैनी व ग्यारसी देवी ने बताया कि मई-जून में देसी मिर्च की पौध तैयार करने के लिए बीज रोपण किया जाता है। पौध 45 से 50 दिन के बीच में तैयार होती हैं। पौध तैयार होने के बाद फसल उत्पादन के लिए एक फीट से डेढ़ फीट के बीच अंतर रखकर पौधरोपण किया जाता है। किसान कौशल्या देवी बताया कि मिर्च की फसल में 15 से 20 दिन के अंतर में तीन - चार बार पुष्पन (फाल) आता है। पुष्पन होने के साथ ही 25 दिन में देसी मिर्च तैयार होती है।

एक बीघा में 15 क्विंटल पैदावार
एक बीघा देसी मिर्च की फसल तैयार करने में खाद, बीज, पानी, दवा सहित अन्य खर्चों में 40 से 45 हजार का खर्च आता है। इसमें एक बीघा में 15 क्विंटल के लगभग मिर्च तैयार होती है। मिर्च का भाव 70 से 100 रुपए प्रति किलो हिसाब से मिलता है। एक बीघा में लगभग डेढ़ लाख रुपए की मिर्ची की बिक्री होती है। वहीं सूखी देसी लाल मिर्च का 500 से 700 रुपए प्रति किलो का भाव मिलता है। देसी मिर्च की शेखावाटी के अलावा यहां के प्रवासियों में भी खासी मांग है। यहां की देसी मिर्च कोलकाता, मुंबई, दिल्ली, जयपुर, गुरूग्राम, हिसार, सीकर नीमकाथाना, श्रीमाधोपुर सहित अन्य मंडियों में नियमित जा रहती है।

जिले में 35 से 40 हेक्टर भूमि में देसी मिर्च की खेती हो रही है। देसी हरी मिर्च प्रति हेक्टर 100 से 150 क्विंटल का उत्पादन रहता है। जिससे प्रति हेक्टर लगभग 10 लाख की आय रहती है। किसान उत्पादन में 70 से 80 प्रतिशत हरी देसी मिर्ची का ही बेचान करता है। बाकी 20 से 30 प्रतिशत सुखा कर बेचता है। सूखी मिर्च महंगी बिकती है।
-शीशराम जाखड़ , सहायक निदेशक उद्यान झुंझुनूं

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