
बच्चों का भविष्य संवार रहे गांधी फेलो, गांव में रहकर समझते हैं जीवनशैली
बच्चों का भविष्य संवार रहे गांधी फेलो, गांव में रहकर समझते हैं जीवनशैली
युगलेश शर्मा.
झुंझुनूं. शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार करने वाले पीरामल फाउंडेशन के दो पायलट प्रोजेक्ट इन दिनों झुंझुनूं जिले में चल रहे हैं। इनके तहत स्कूली बच्चों के भावनात्मक विकास के लिए साल भर कई गतिविधियां की जाती है। इस दौरान गांधी फेलो गांव में एक महीने किसी मजदूर या किसान के घर में रह कर भी बिताते हैं ताकि उनकी और बच्चों की जीवन शैली को करीब से समझ सकें और उसे महसूस कर सकें। इतना ही नहीं यह गांधी फेलो गांव में छह दिन मजदूरी भी करते हैं।
210 स्कूलों में चल रहा कार्यक्रम
पीरामल फाउंडेशन ने 2019 में सील (सोशल इमोशनल एथिकल लर्निंग) पीसा (प्रोग्राम फोर इंटरनेशनल स्टूडेंट्स एसेसमेंट्स) कार्यक्रम शुरू किए हैं। इसमें कक्षा 6 से 8 तक के बच्चों को नवाचारों के माध्यम से कुछ ना कुछ सिखाया जाता है। इसके लिए पायलट प्रोजेक्ट के रूप में फिलहाल झुंझुनूं जिले के 210 पंचायत स्तर की स्कूलों का चयन किया गया है। यहां यह प्रोग्राम 2025 तक चलेंगे, इसके बाद अन्य जिलों में शुरू किया जा सकेगा।
क्या करते हैं गांधी फेलो
एक महीने में गांव में रहने के लिए गांधी फेलो स्कूल में पढ़ने वाले किसी बच्चे के घर का चयन करता है। वह जिस घर में रहना चाहता है, उस परिवार के लोग खुशी-खुशी उसे अपने घर में रखने के लिए राजी हो जाते हैं। इस दौरान गांधी फेलो का खान-पान व रहन सहन भी वही होता है जो उस परिवार का होता है। इस दौरान महीने में छह दिन अलग-अलग मजदूरी भी करते हैं।
स्कूलों में यह होती है गतिविधियां
-पाठ्यक्रम में शामिल सामग्री को बच्चे अपने दैनिक जीवन में कैसें उपयोग करें।
-बच्चों में व्यवहारगत बदलाव लाने के करूणामयी गतिविधियों का आयोजन।
-भावनाओं को प्रदर्शित करते लिए खुशियों की दीवार और सील लाइब्रेरीका निर्माण।
-गांव के लोगों के साथ गांव के मुद्दे और उनके समाधान पर चर्चा।
-बच्चों की शिक्षा में माता-पिता की भूमिका को समझाना।
यह है उद्देश्य
विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों का सर्वांगीण विकास हो सके और वह सभी एक आदर्श नागरिक के रूप में स्वंय को भविष्य के लिए तैयार कर सकें।
मारवाड़ी नहीं समझती फिर भी केरल की ऐश्वर्या रही उदावास गांव में
पीरामल फाउंडेशन के अशग़ाल खान ने बताया कि गांधी फ़ेलो के रूप में कार्यरत केरल की ऐश्वर्या झुंझुनू ब्लॉक के एक गांव उदावास में एक महीने तक एक परिवार में रहीं। खास बात यह है हिन्दी और मारवाड़ी में पकड़ नहीं होने के बावजूद उसने एक महीने समुदाय में गुजारा और वहां के लोगों की जीवनशैली और संस्कृति को समझा। इसके अलावा ऐश्वर्या ने वहां विद्यार्थियों के लिए एक विद्यार्थी अधिगम केंद्र बनाया, विद्यालय में किचन गार्डन बच्चों से बनवाया। समस्याओं और समाधान के लिए ग्रुप डिस्कशन किया। साथ ही मजदूरी करके यह संदेश दिया कि महिला-पुरुष समान हैं और वह किसी भी कार्य को अपनी क्षमताओं व दक्षताओं के आधार पर कर सकते हैं।
दिल्ली के हरीश ने फरत गांव में लोगों को किया जागरूक
प्रोग्राम लीडर ख़ुलूस खान ने बताया कि सामाजिक भावनात्मक और नैतिक शिक्षण कार्यक्रम से गांधी फेलो हरीश कुमार ने ग्राम फरत के समुदाय में रहकर गांव के रहन सहन को समझा व समुदाय व शिक्षकों के साथ करुणामयी गतिविधियां आयोजित की। इसके तहत बताया गया की हम अपने प्रति करुणामयी रहेंगे तभी हम दूसरों के प्रति करुणा रख सकते हैं। साथ ही किसी भी समुदाय के विकास में सामाजिक भावनात्मक एवं नैतिक शिक्षण के महत्व के बारे में लोगों को जागरूक किया जाता है। सील प्रोग्राम मैनेजर राजेन्द्र सिंह और प्रोग्राम लीडर शेरसिंह ने बताया कि एक प्रक्रम पूर्ण होने के बाद ये फ़ेलो जिले के अन्य विद्यालयों में इसी तरह नवाचारों के माध्यम से बच्चों के सर्वांगिण विकास की गतिविधियों का आयोजन करते हैं।
Published on:
08 Jan 2023 04:06 pm

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