
Acharya Mahapragya
आचार्य महाप्रज्ञ। यह नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं। पूरी दुनिया जानती हैं इन्हें। हम सबको अहिंसा का संदेश इन्होंने ही तो दिया।छोटे से गांव टमकोर से तेरापंथ धर्मसंघ के दसवें धर्मगुरु तक का सफर तय किया। 9 मई 2010 को आचार्य महाप्रज्ञ देवलोकगमन कर गए, मगर इनके बताए अहिंसा के मार्ग पर दुनियाभर में लाखों आज भी चल रहे हैं। महाप्रज्ञ के निर्वाण दिवस पर पेश है एक रिपोर्ट।
वर्ष 1920 में जन्मे
मलसीसर उपखण्ड मुख्यालय से 15 किमी दूर गांव टमकोर में 14 जून 1920 को चोरडिय़ा परिवार में आचार्य महाप्रज्ञ का बचपन का नाम नथमल (नत्थू) था। इन्होंने स्कूल में प्राथमिक स्तर तक की पढ़ाई भी नहीं की, मगर इनके लिखे साहित्य पर अनेक शोधार्थी पीएचडी कर चुके हैं। हिंसा से ग्रस्त विश्व को अंहिसा का सन्देश देने के लिए आचार्य ने वर्ष 2001 से 2004 तक अंहिसा यात्रा का नेतृत्व किया।
साढ़े दस वर्ष की उम्र में ली दीक्षा
आचार्य महाप्रज्ञ ने साढ़े दस वर्ष की उम्र में अपनी मां साध्वी बालूजी के साथ माघ शुक्ला 10, वि.सं. 1987 में सरदारशहर में भंसालीजी के बाग में दीक्षा ली। 5 फरवरी 1995 को महाप्रज्ञ का आचार्य के रूप में पदाभिषेक हुआ। आचार्य तुलसी ने 12 नवम्बर 1978 में इनको महाप्रज्ञ अलकंरण से अलंकृत किया।
इनका कहना है...
&आचार्य महाप्रज्ञ सन्त होने के साथ-साथ दार्शनिक, लेखक एवं वक्ता भी थे। वे दिव्य आत्मा के साथ रहस्य विद्या के भी ज्ञाता थे। ऐसे महान संत की जन्म भूमि पर रहकर लोगों की सेवा करना ही सबसे बड़ा सौभाग्य का काम है।
-समणी पुण्य प्रज्ञा, निदेशिका, आचार्य महाप्रज्ञ इंटरनेशनल स्कूल टमकोर
टमकोर की पावन धरा पर आचार्य महाप्रज्ञ ने जन्म लेकर विश्व में कस्बे को गौरवान्वित किया है। उन्होंने देश व समाज के लिए अंहिसा को लेकर काफी संदेश दिया, जिससे लोगों में निर्दयता की भावना कम हो सके।
-रतनलाल नाहटा, टमकोर
मुझे गर्व है कि मैंने भी उसी पावन धरा पर जन्म लिया, जहां पर युग प्रधान आचार्य महाप्रज्ञ ने जन्मे थे।टमकोरवासियों को अपनी जन्मधरा पर नाज है जिसने विश्व को एक महान सन्त के रूप में आचार्य महाप्रज्ञ दिया।
-राजेश कुमार आर्य, टमकोर
Published on:
09 May 2017 12:08 pm
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