
invitation of 17th century
हाइटेक युग में जहां वाट्सएप, एसएमएस, फेसबुक के माध्यम से सूचनाओं, फोटो-वीडियों आदि को दुनिया के किसी भी कोने में भेजा जा सकता है। वहीं जोधपुर के पीडब्ल्यूडी रोड स्थित प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान में 17 से 20 वीं शताब्दी में संचार साधनों के अभाव के दौरान जैन संतों को लिखे गए 8 से 15 मीटर लंबे चित्रात्मक खरड़े नुमा सचित्र निमंत्रण पत्रों का अनूठा संग्रह मौजूद है।
आत्म जागृति के पर्व चातुर्मास के लिए जैन साधु संतों को नगर में आमंत्रण की परम्परा जितनी अनूठी है उतने ही नायाब उन्हें भेजे जाने वाले निमंत्रण पत्रों की शृंखला भी है। इन निमंत्रण पत्रों में तत्कालीन समाज, संस्कृति, नगरीय वैभव का वर्णन समाहित है। लोकभाषा, प्राकृत व संस्कृत में लिखे 'चौमासा' निमंत्रण पत्रों में तत्कालीन धार्मिक स्थलों, वाणिज्यक गतिविधियों व सामाजिक सांस्कृतिक विषय वस्तु की जानकारी मिलती है। इतिहास व साहित्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण निमंत्रण पत्रों की शुरुआत भगवान महावीर की माता त्रिशला की ओर से स्वप्न में देखे गए 21 शुभ चिह्नों से होती थी।
प्रतिष्ठान के वरिष्ठ शोध अधिकारी डॉ. कमलकिशोर सांखला के अनुसार विक्रम संवत 1802 का एक 8.5 मीटर लंबा एवं 30 सेमी चौड़ा खरड़ानुमा ( स्क्रॉल) सचित्र चातुर्मास निमंत्रण पत्र है जिसमें भवन, हाथी, घोड़े, जैन साधु, बाजार, और श्रीनाथ मंदिर का सुंदर चित्रांकन है। मेवाड़ चित्रशैली के निमंत्रण पत्र को विनयसागर ने लाशुनाक्य नगर में चातुर्मास आराधाना के लिए कल्याण सूरि को प्रेषित किया था। इसी तरह विक्रम संवत 1892 को सूरत में विराजित विजयदेव सूरि को जोधपुर से प्रेषित चातुर्मास निमंत्रण में जोधपुर नगर का सांस्कृतिक चित्रण से जुड़ा चातुर्मास पत्र मौजूद है।
सांस्कृतिक विषय वस्तु का चित्रण प्रतिष्ठान में जैन विषयों के विविध धार्मिक ग्रंथों की शृंखला में 17वीं से 20 वीं शताब्दी के चातुर्मास विज्ञप्ति व निमंत्रण पत्रों का संग्रह है जिसमें तत्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक विषय वस्तु का चित्रण किया गया है। निर्मला मीना, निदेशक प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान जोधपुर।
Published on:
03 Aug 2016 03:31 pm
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