
Ace Archer Arjun and Sister of Lord Krishna Subhadra were married in Jodhpur!
सूर्यनगरी का संबंध रामायण काल के रावण ओर मंदोदरी से तो है ही, इसका पौराणिक इतिहास महाभारत काल से भी जुड़ा हुआ है। जोधपुर जिले के लूणी तहसील के सर गांव में स्थित सुभद्रा माता मंदिर से कई कहानियां जुड़ी हुई हैं।
इस मंदिर के बारे में एेसा कहा जाता है कि यहां पर भगवान श्रीकृष्ण की बहन और पाण्डु पुत्र धनुर्धारी अर्जुन की पत्नी सुभद्रा ने कुछ समय बिताया था। यहीं पर दोनों की शादी हुई थी। कालांतर में इस स्थान पर सुभद्रा माता ने भाखर (पहाड़ी) में साक्षात दर्शन दिए थे, तब से अब तक सुभद्रा माता की पूजा अर्चना की जा रही है।
कलबी कुल के सुरो बापू भुंगर को दिए थे दर्शन
वर्तमान पुजारी भोपाजी भलाराम भुंगर व गांव के बुजुर्गो के अनुसार सर गांव में करीब 107 वर्ष पहले सन 1910 में कलबी कुल के सुरो बापू भुंगर को सुभद्रा माता ने दर्शन देकर वचनसिद्धि का वरदान दिया था। उसके बाद सुरो बापू भुंगर ने 12 साल तक अपने खेत में सुभद्रा माता की पूजा-अर्चना की।
बाद में तत्कालीन ठाकुर विजयसिंह के शासन में मुख्य गांव से करीब तीन किलोमीटर दूर स्थित पहाड़ी में बनी प्राकृतिक गुफा में पुजा-अर्चना की शुरुआत की। बाद में उन्होंने वहां मंदिर कमरा, टांका, चौक व मंदिर पर चढऩे के लिए सीढि़यों का निर्माण करवाया था। वर्तमान पुजारी भोपाजी भलाराम भुंगर सुरो बापू भुंगर के पौत्र हैं।
नवरात्र में भव्य आयोजन
पुजारी भलाराम ने बताया कि नवरात्रि में मंदिर में भव्य आयोजन होता है, यहां हर वर्ष 36 कौम के लोग बड़ी संख्या में दर्शन करने आते हैं। साथ ही, यह पर्यटन के आकर्षण केन्द्र के रूप में भी प्रसिद्ध हो चुका है। सच्चे मन से पूजा करने वाले भक्तों की हर मनोकामना यहां पूरी होती है। मंदिर में दिन में दो बार आरती होती है और विशेष अवसरों पर भजन-कीर्तन व रात्रि जागरण भी होते है। वर्तमान में मंदिर की गतिविधयों, व्यवस्थाओं आदि की देखभाल एक ट्रस्ट द्वारा की जा रही है।
दिवान्दी से भी सुभद्रा-अर्जुन का नाता
सुभद्रा-अर्जुन का नाता सर गांव से ही नहीं, बल्कि पाली जिले के दिवान्दी गांव से भी है। जिसका पौराणिक नाम ताबावंती था, बाद में इसे देवनगरी कहा जाने लगा। वर्तमान में यह दिवान्दी नाम से जाना जाता है। क्षेत्र के बुजुर्गो के अनुसार इस स्थान पर सुभद्रा-अर्जुन का पाणिग्रहण संस्कार हुआ था। इनका विवाह महर्षि वेद व्यास ने करवाया था। जहां तोरण बांधने की रस्म हुई थी, वहां अर्जुन-सुभद्रा ने भगवान शिव का लिंग स्थापित किया, जिसे तोरणेश्वर महादेव मंदिर कहा जाने लगा।
सुभद्रा-अर्जुन ने बसाया था भाद्राजून!
दिवान्दी से आगे जाकर सुभद्रा-अर्जुन ने एक नगर बसाया, जिसे वर्तमान में भाद्राजून कहा जाता है। एेसा कहा जाता है कि महाभारत काल में पाण्डवों ने इस स्थान पर 12 सालों तक तपस्या की थी। इन बारह सालों में एक बार भी सोमवती अमावस्या नहीं आई। इस पर पाण्डवों ने श्राप दिया कि कलयुग में हर साल सोमवती अमावस्या आएगी, तभी से सोमवती अमावस्या हर वर्ष आने लगी। मंदिर के पीछे के एक भाग में एक प्राचीन गुफा है, जो सर गांव स्थित सुभद्रा माता मंदिर तक जाता है।
Published on:
27 Feb 2017 11:54 pm

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