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Khichan : खीचन की यह खासियत, विश्व में दिला रही पहचान

कहते हैं जहां हिंसक घटनाएं नहीं होती, वहां समृद्धि, सुकून और शांति होती है। कुछ यही इतिहास जोधपुर के सबसे समृद्ध रियासत कालीन जागीरी गांव खीचन का भी है, जहां गांव की बसावट के बाद अब तक एक भी शिकार नहीं हुआ और ना ही कभी कोई हिंसक घटनाएं हुई।  

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Khichan : पहले जागीरी गांव से तो अब कुरजां ने दिलाई खीचन को विश्व स्तर पर पहचान

खीचन की हवेली।

350 सालों में नहीं शिकार, समृद्धशाली गांव की मिली पहचान


खीचन (जोधपुर) कहते हैं जहां हिंसक घटनाएं नहीं होती, वहां समृद्धि, सुकून और शांति होती है। कुछ यही इतिहास जोधपुर के सबसे समृद्ध रियासत कालीन जागीरी गांव खीचन का भी है, जहां गांव की बसावट के बाद अब तक एक भी शिकार नहीं हुआ और ना ही कभी कोई हिंसक घटनाएं हुई।

यही कारण है कि फलोदी के खीचन गांव की प्रसिद्धि गांव से निकल कर विश्व पटल पर छा गई है। आजादी से पहले पश्चिमी राजस्थान अभावग्रस्त गांवों के तौर पर पहचाना जाता था, लेकिन फलोदी का खीचन गांव राजाओं के समय से समृद्धशाली गांवों की श्रेणी में रहा है।

यहां की हवेलियां व नाडियां गांव की समद्धशाली इतिहास को प्रमाणित कर रही है। यहां गत सात दशक से हर साल करीब 35 हजार साइबेरियन बर्ड कुरजां डेरा डालती है, जिसकी सेवा में यहां के ग्रामीण पलक पांवडे बिछाकर आवभगत करते हैं। संभवत: विश्व में ऐसा कहीं नहीं है कि एक साथ 35 हजार कुरजां का प्रवास हो और वहां पर शिकार की घटनाएं नहीं होती है।

बीकानेर के महाराजा के अधीन था यह गांव

जानकारों की मानें तो रियासतकालीन युग में खीचन गांव बीकानेर के अधीन था। खीचन गांव की स्थापना विक्रम संवत 1972 में खीचन के तत्कालीन जागीरदार महासिंह अखेराजोत ने की थी। इसके बाद बीकानेर रियासत के पूर्व शासक महाराज अनूपसिंह ने खीचन में रकबा 32 हजार बीघा जमीन की जागीर महासिंह को दी थी।

इसके बाद जागीरदार महासिंह ने छोटे किला बनवा कर खीचन गांव बसाया और ग्रामीणों की सुविधा के लिए पानी के स्रोत के तौर पर नीमली नाडी, रातड़ी नाडी, उन्नू नाङी, ढोलकी नाडी, दीपोलाई नाड़ी का निर्माण करवाया तो यहां पेयजल की व्यवस्था बहुत अच्छी रही। गांव में बीकानेर में महारावल अभयसिंह ने लक्ष्मीनारायण मंदिर निर्माण करवाकर कसोरी धातु की लक्ष्मीनारायण भगवान की मूर्ति स्थापित की। यह मूर्ति अहमदाबाद युद्ध के दौरान लाई गई थी।

इसलिए खीचन गांव है खास

खीचन गांव की बसावट 1741 विक्रम संवत की मानी जाती है और गांव की बसावट और जागीरी गांव घोषित होने के साथ ही जागीरी क्षेत्र में किसी तरह के शिकार पर प्रतिबंध लगा दिया गय। इसकी पालना की जा रही है और अब भी गांव का कोई व्यक्ति शिकार नहीं करता है। यही कारण रहा कि यहां जैन धर्मावलम्बियों ने यहां अपनी हवेलियां बनवाई। जो वर्तमान में गांव का वैभवशाली इतिहास की गवाह है।

आकर्षक है बड़ी हवेलियों की नक्काशी

खीचन गांव लाल पत्थर से 50 के करीब हवेलियां बनी हुई है, जिसमें से तीन हवेलियों की नक्काशी और बनावट देखते ही बनती है। यह सभी हवेलियां जैन धर्मावलम्बियों ने बनवाई है। इनके निर्माण के सौ साल बाद भी हवेलियों की चमक और बनावट आकर्षण का केन्द्र है।

फैक्ट फाइल
- 350 साल पुराना रियासतकालीन जागीरी गांव है खीचन।
- 35 हजार के करीब हर साल कुरजां यहां करती है शीतकालीन प्रवास।
- 50 के करीब हवेलियां खीचन गांव की समृद्धि का कर रही बखान।
- 135 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है खीचन से जोधपुर जिला मुख्यालय।
- 350 सालों में एक भी शिकार की घटना नहीं हुई अब तक खीचन गांव में
- 3 नक्काशीदार हवेलियां, कुरजां की कलरव व पांच नाडियां बढा रही गांव का गौरव
-10 हजार से अधिक की आबादी बसती है खीचन गांव में


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