
Rajasthan High Court Overturns Family Court Order (Photo-AI)
Rajasthan High Court: राजस्थान हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट, मेड़ता की ओर से मुस्लिम महिला की तलाक याचिका खारिज किए जाने के आदेश को रद्द करते हुए स्पष्ट किया है कि पति-पत्नी की आपसी सहमति से हुआ ‘मुबारात’ (तलाक) मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत पूर्णतः वैध है। कोर्ट ने कहा कि ‘मियां-बीवी राजी, तो काजी क्या करेगा’ की भावना मुस्लिम कानून में निहित है।
न्यायाधीश अरुण मोंगा एवं न्यायाधीश योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने 24 वर्षीय महिला की अपील स्वीकार करते हुए कहा कि पति की ओर से तीन अलग-अलग तुहर में तलाक दिए जाने तथा बाद में सहमति से लिखित तलाकनामा होने से विवाह पहले ही समाप्त हो चुका था। फैमिली कोर्ट ने गवाहों के अभाव को आधार बनाकर तलाक को अमान्य मानते हुए याचिका खारिज कर दी थी, जिसे हाईकोर्ट ने कानूनी रूप से गलत ठहराया।
खंडपीठ ने कहा कि संबंधित दंपती सुन्नी मुसलमान हैं और सुन्नी कानून में तलाक के लिए दो गवाहों की अनिवार्यता नहीं है, यह शर्त केवल शिया कानून में लागू होती है। दोनों पक्षों ने अदालत में स्वीकार किया कि पति ने 8 जून, 8 जुलाई और 8 अगस्त 2024 को अलग-अलग तुहर में तलाक दिया था, जिसे पत्नी ने स्वीकार किया। इसके बाद 20 अगस्त 2024 को स्टांप पेपर पर आपसी सहमति से तलाक का लिखित समझौता भी किया गया।
राजस्थान हाईकोर्ट ने पटवारी भर्ती में एक महिला अभ्यर्थी की उम्मीदवारी यह कहकर खारिज किए जाने को प्रथम दृष्टया गलत माना है कि उसकी शादी कम उम्र में हुई थी, इसलिए वह जनरल-विधवा श्रेणी के आरक्षण की पात्र नहीं है। कोर्ट ने कहा कि यदि विवाह को कभी चुनौती नहीं दी गई हो तो वह कानूनन वैध माना जाएगा और शादी के समय की उम्र विधवा आरक्षण के अधिकार को प्रभावित नहीं कर सकती। यह टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने जनरल-विधवा कोटे का एक पद खाली रखने के निर्देश दिए हैं।
न्यायाधीश मुन्नुरी लक्ष्मण की एकल पीठ में याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि याची ने ओबीसी श्रेणी के तहत आवेदन किया था और साथ ही जनरल-विधवा श्रेणी का लाभ भी मांगा था। चयन प्रक्रिया में वह मेरिट में पाई गई और उसका नाम अस्थायी रूप से चयन सूची में भी आया। बाद में 31 दिसंबर,2025 के एक साझा आदेश से यह कहते हुए उसकी उम्मीदवारी रद्द कर दी गई कि विवाह के समय उसकी उम्र विवाह योग्य नहीं थी, इसलिए वह विधवा आरक्षण की हकदार नहीं है।
कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 का हवाला देते हुए कहा कि भले ही दुल्हन की विवाह योग्य उम्र 18 वर्ष निर्धारित है, लेकिन इस शर्त के उल्लंघन में हुआ विवाह स्वतः शून्य नहीं होता, बल्कि केवल संबंधित पक्ष की मांग पर निरस्त किया जा सकता है। चूंकि याचिकाकर्ता के विवाह को कभी चुनौती नहीं दी गई, इसलिए वह सभी कानूनी उद्देश्यों के लिए वैध माना जाएगा। ऐसे में विवाह के समय की उम्र को आधार बनाकर विधवा आरक्षण से वंचित करना उचित नहीं है।
पीठ ने यह भी कहा कि भर्ती विज्ञापन की शर्तों में कहीं यह नहीं लिखा है कि यदि किसी महिला की शादी कम उम्र में हुई हो तो वह विधवा आरक्षण के लिए अयोग्य हो जाएगी। जब ऐसी कोई शर्त मौजूद नहीं है, तो विभाग का यह रुख प्रथम दृष्टया उचित नहीं है। पीठ ने निर्देश दिया कि जनरल-विधवा श्रेणी का एक पद फिलहाल खाली रखा जाए।
Published on:
22 Jan 2026 11:24 am
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