
एआई तस्वीर
संदीप पुरोहित
जोधपुर केवल एक ऐतिहासिक शहर नहीं, बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहर, हस्तशिल्प और कृषि परंपराओं का प्रतिनिधि है। हमारी लोक परंपराएं, रीति रिवाज, तीज त्योहार, विरासत, कला कौशल हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा है। इसी को आज वैश्विक स्तर पर मजबूत करने की सख्त आवश्यकता है। ग्लोबल ब्रांडिग हमारी समृद्धि से सीधी जुड़ी हुई है। इसके लिए हमारे उत्पादों को जीआइ टैग की आवश्यकता है।
जोधपुर से जुड़े सात विशिष्ट उत्पादों को भौगोलिक संकेतक (GI टैग) दिलाने की दिशा में हम सबको मिलकर कदम बढ़ाने होंगे। अहमदाबाद में जीआइ टैग की सुनवाई की आखिरी घड़ी आ गई है। सारी ताकत के साथ हमें हमारे सातों उत्पादों को रखना होगा। प्रदेश से कुल 14 में से सर्वाधिक 7 आवेदन अकेले जोधपुर के हैं। यह हमारी समृद्ध विरासत, विविधता और विशिष्टता की एक बानगी भर है।
जिन उत्पादों पर जीआइ टैग की मांग की जा रही है, उनमें पत्थर की छतरियां, आयरन क्राफ्ट, वुडन क्राफ्ट (फर्नीचर), जोधपुरी साफा, राजस्थानी लहरिया, मथानिया मिर्च और राजस्थानी जीरा शामिल हैं। इन उत्पादों का न केवल ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व है, बल्कि ये आज भी हजारों कारीगरों, किसानों और पारंपरिक व्यवसायों से जुड़े परिवारों की आजीविका का आधार हैं।
गौरतलब है कि इन सात में से चार उत्पाद जोधपुरी साफा, राजस्थानी लहरिया, मथानिया मिर्च और राजस्थानी जीरा के लिए आवेदन राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) के सहयोग से किया गया है। मथानिया मिर्च और राजस्थानी जीरे के लिए तिंवरी कृषक उत्पादक संगठन, जबकि जोधपुरी साफा और लहरिया के लिए संग वेलफेयर सोसायटी आवेदनकर्ता संस्था है। मथानिया मिर्च के मामले में कृषि विश्वविद्यालय, जोधपुर भी सहयोगी भूमिका निभा रहा है।
जीआइ टैग किसी भी उत्पाद को उसके विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र से जोड़ता है। साथ ही यह प्रमाणित करता है कि उस वस्तु की गुणवत्ता, प्रतिष्ठा और विशेषताएं उसी क्षेत्र की देन हैं। यह गुणवत्ता की मोहर है। उदाहरण के तौर पर मथानिया मिर्च की खुशबू और रंग, जोधपुरी साफे की खास बांधनी और रंग संयोजन, राजस्थानी जीरे की खुशबू हमारे उत्पादों की विशेषताएं हैं। जीआइ टैग मिलने से उत्पादों की नकल पर रोक लग जाएगी। कानूनी संरक्षण प्राप्त हो जाएगा। नक्कालों पर लगाम लग जाएगी। हमारा व्यापार निश्चित तौर पर बढ़ेगा।
इसका सबसे बड़ा लाभ सीधे तौर पर किसानों और कारीगरों को मिलेगा। जीआइ टैग के बाद उत्पादों को बेहतर बाजार मूल्य , निर्यात भी मिलेगा। नए रास्ते खुलेंगे। दलालों और बिचौलियों पर भी अंकुश लगेगा। इससे स्थानीय रोजगार को गति मिलेगी। जब रोजगार मिलेंगे तो निश्चित तौर पर नई पीढी के समक्ष हमारे पारंपारिक कला कौशल और ज्ञान का संवद्धन होगा। यही नहीं इससे पर्यटन को भी पंख लगेंगे। अगर हमारे उत्पादों को जीआइ टैग मिलता है तो इससे जोधपुर मारवाड की ब्रांड वैल्यू बढ़ेगी। इससे हमारे उत्पादों की साख बढ़ेगी।
प्रदेश में अब तक 21 उत्पादों को जीआइ टैग मिल चुका है, जिनमें सोजत की मेहंदी, बीकानेरी भुजिया, कोटा डोरिया, सांगानेरी और बगरू प्रिंट, नाथद्वारा की पिछवाई पेंटिंग, जोधपुरी बंधेज और मकराना मार्बल शामिल हैं। यह सूची राजस्थान की समृद्ध लोक संस्कृति की एक बानगी है।
अब जबकि अहमदाबाद में जीआइ टैग को लेकर अंतिम सुनवाई चल रही है और दो-तीन माह में परिणाम आने की उम्मीद है। सरकार की सभी एजेंसियों को मिलकर इसके लिए प्रयास करने होंगे। यह समय है कि सरकार, प्रशासन और समाज मिलकर इन उत्पादों के संरक्षण, प्रचार और बाजार विस्तार की ठोस रणनीति के साथ उतरे। जीआइ टैग केवल एक प्रमाणपत्र नहीं, बल्कि जोधपुर की आत्मा, परंपरा और मेहनत की वैश्विक स्वीकृति होगी। अगर यह मोहर लगती है तो यह पूरे पश्चिमी राजस्थान के लिए गर्व और अवसर दोनों लेकर आएगी।
Updated on:
07 Feb 2026 03:00 pm
Published on:
07 Feb 2026 03:00 pm
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