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खेजड़ी पर ये कैसा प्रकोप, सांगरी की जगह लग रही ‘गिरडू’

खेजड़ी का पेड़ किसी अज्ञात बीमारी की चपेट में आ गया है। इसके चलते इन पेड़ों पर सांगरी की जगह 'गिरडू ज्यादा उग रहे हैं, जिसे इंसान तो क्या पशु ही नहीं खाते। इससे घरों में चटपटी सांगरी का जायका गायब हो रहा है।

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Harshwardhan Singh Bhati

Apr 26, 2016

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जिले के खेजड़ली गांव में खेजड़ी के पेड़ बहुतायत से पाए जाते हैं, लेकिन उन पर हर साल अप्रेल में दिखने वाले सांगरी के गुच्छे गायब हो चुके हैं। उनकी जगह 'गिरडू लग रहे हैं, जो एक प्रकार की गांठें हैं। वैसे ये गांठें खेजड़ी के पेड़ पर अमूमन सांगरी के साथ कुछ पत्तों पर थोड़ी बहुत हर साल निकलती हैं, लेकिन इस साल सांगरी की जगह गांठें ही ज्यादा निकल रही हैं।

तो वे चौंक गए

उत्पादन पहले से कई गुना कम होने से बाजार में सूखी सांगरी के भाव अधिकतम 1000 रुपए किलो तक पहुंच गए हैं। वहीं 10 प्रतिशत सांगरी बाकी सब गिरडू खेजड़ली निवासी वार्ड पंच सोहनलाल विश्नोई की अपने खेत पर एक खेजड़ी के पेड़ पर नजर पड़ी तो वे चौंक गए। क्योंकि इन्हीं पेड़ों पर पिछले साल सांगरी के गुच्छे लबालब भरे थे। अब उनकी जगह गांठें मिलीं।

जिले में लूणी तहसील के गुढा विश्नोईयान, खेजड़ली, फलौदी, लोहावट, भींयासर, भोजासर, औसिंया, एकलखोरी जैसे गांवों के साथ बाड़मेर, नागौर व बीकानेर क्षेत्र में भी यही हालात हैं। आफरी में भी खेजड़ी का कोई पेड़ इस बीमारी से नहीं बचा।

वैज्ञानिकों को जांच के लिए दिए

एक एक पेड़ पर सिर्फ 10 प्रतिशत ही सांगरी निकली बाकी सब पत्तों पर गिरडू ही निकल रहे हैं। सोहनलाल ने खेतों से गिरडू तोड़ कर आफरी के वैज्ञानिकों को जांच के लिए दिए हैं। अब तक तो आफरी वैज्ञानिकों को भी इसके बारे में पता नहीं था।

10 किलो की जगह सिर्फ 2 किलो

खेतों से सांगरी तोड़ रही खेजड़ी निवासी सोहनी देवी, जिया देवी ने बताया कि खेजड़ी पर फूल खूब आ रहे हैं, लेकिन उसमें सांगरी की फली नहीं निकल रही। पिछले साल रोजाना 10 किलो सांगरी निकाल लाती थी। अब 2 किलो ही मुश्किल से होती है।

रसोई की रौनक खत्म

गांवों में रसोई की रौनक ही खत्म हो गई। मारवाड़ में शीतला अष्टमी को ठंडा पूजने पर घर घर में सांगरी की सब्जी या अचार बनाया जाता है। जो गर्मी में खराब न होने से कई दिनों तक खाया जा सकता। सांगरी आयुर्वेद व फसलों में जैविकता बढ़ाने के लिए खाद के रूप में इस्तेमाल की जाती है। यह पशु पक्षियों का प्राकृतिक आहार है। सीजन के दौरान गांवों में सांगरी से अच्छी आमदनी होती है।

हमें तो अभी पता चला है

हमें इसके बारे में अभी पता चला है। ये एक प्रकार के कीड़े होते हैं, जो पत्तियों पर लगे रहते हैं। जब गर्मियों में फूल व फल आते हैं, उस समय ये अटैक करते हैं। उसके बाद सांगरी की जगह गांठें निकल जाती हैं।

अब इसकी छंगाई करते समय खेजड़ी पर एक माह के अंतराल में मोनाक्रोटोफॉस का (10 लीटर पानी में 15 एमएल) का छिड़काव कर दें तो अगले साल यह बीमारी नहीं रहेगी। इस साल तो गांठें ही रहेंगी।

- केके श्रीवास्तव, वरिष्ठ वैज्ञानिक, आफरी