
क्षमता होने के बावजूद खुली जेल में नहीं भेज रहे बंदी
जोधपुर. राजस्थान हाईकोर्ट ने क्षमता होने के बावजूद पात्र कैदियों को खुली जेलों में नहीं भेजने को गंभीरता से लिया है। खुली जेलों और उनमें सुविधाओं के विस्तार पर जोर देते हुए कोर्ट ने विस्तृत दिशा-निर्देश देने के लिए आदेश को सुरक्षित रखा है।
वरिष्ठ न्यायाधीश संगीत लोढ़़ा और न्यायाधीश विनीतकुमार माथुर की खंडपीठ में एक याचिका की सुनवाई के दौरान बताया गया कि छह साल आठ महीने की सजा पूरी करने वाले कैदी आचरण के आधार पर खुली जेल में भेजने के पात्र होते हैं। लेकिन इन्हें खुली जेल में भेजने वाली कमेटी की बैठकें नियमित अंतराल में नहीं होने से पात्र कैदियों को खुली जेल जाने से वंचित रहना पड़ रहा है।
राज्य सरकार की ओर से दायर शपथ पत्र के अनुसार अप्रेल, 2019 में आयोजित बैठक में 230 कैदियों को खुली जेल भेजने का निर्णय किया गया था और एक सौ कैदियों की प्रतीक्षा सूची तैयार की जा रही है। वर्तमान में राज्य में 36 खुली जेलों में 1392 कैदियों को रखने की क्षमता है और तीन सौ से ज्यादा कैदियों की जगह खाली है।
अतिरिक्त महाधिवक्ता फरजंद अली तथा करणसिंह राजपुरोहित ने कोर्ट को बताया कि वर्तमान में 26 जिलों में खुली जेलें उपलब्ध हैं, जिनमें छह जिलों में इनकी संख्या एक से ज्यादा है। अन्य स्थानों पर भी खुली जेल खोलने की प्रक्रिया चल रही है। याचिकाकर्ता की ओर से कानाराम भाटी ने पैरवी की।
रिपोर्ट में सामने आए कई तथ्य
सुनवाई के दौरान पेश राजस्थान विधिक सेवा प्राधिकरण की ओर से खुली जेलों पर प्रकाशित रिपोर्ट तैयार करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता स्मिता चक्रवर्ती ने बताया कि बंद जेलों के मुकाबले खुली जेलों पर बहुत कम खर्च करना पड़ता है। ऐसी जगह रहने से कैदियों के व्यवहार में भी सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिला है। लेकिन इनकी संख्या और संसाधनों में विस्तार की जरूरत है। उन्होंने बताया बंद जेल में जहां राज्य सरकार औसतन 7,094 रुपए प्रतिमाह प्रति बंदी खर्च करती है, जबकि ओपन जेल में यह खर्च 500 रुपया ही है। जेल में प्रत्येक छह कैदी पर एक स्टाफ द्वारा निगरानी की जरूरत है, जबकि ओपन जेल में 80 कैदियों पर मात्र एक स्टाफ की जरूरत है।
Updated on:
20 Sept 2019 08:20 pm
Published on:
20 Sept 2019 08:20 pm
