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Diwali: तीन पीढ़ियों से मुस्लिम परिवार बना रहा लक्ष्मी पूजन की रेशम की मालाएं

Diwali: अब्दुल करीम तीन पीढ़ियों से 100 परिवारों के साथ मिलकर दीपावली पर लक्ष्मी पूजन में काम में आने वाली रेशम की मालाएं तैयार करते हैं।

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अमित दवे। अब्दुल करीम तीन पीढ़ियों से 100 परिवारों के साथ मिलकर दीपावली पर लक्ष्मी पूजन में काम में आने वाली रेशम की मालाएं तैयार करते हैं। इन मालाओं की तैयार करने की प्रक्रिया भी अपने आप में अनोखी है। दो माह पहले ही इसकी तैयारी शुरू हो जाती है और करीब पांच सौ लोग सीधे तौर पर इस कार्य में जुड़ जाते हैं।

सूरत-अहमदाबाद से आता है कच्चा माल
रेशम की माला के लिए सूरत- अहमदाबाद, दिल्ली से कच्चा माल सफेद कपड़े के रूप में आता है। बाद में कारीगर इनकी सफाई करके लाल-पीला, हरा-गुलाबी, केसरिया-हरा आदि रंगों के पानी में भिगोकर रंगीन करते हैं। इसके बाद इनको सुखाया जाता है, जाला निकाल तार सीधा किया जाता है, जिसमें काफी मात्रा में वेस्टेज निकलता है। इसके बाद महिला-पुरुष कारीगर लकड़ी के पाटे पर अलग-अलग डिजाइन देकर अपने हाथों से माला बनाते है। इसमें रेशम के अलावा, धागा प्लास्टिक की जरी काम में आती है, जो माला के बीच में लगती है।

पूरे साल काम चलता है
रेशम की माला बनाने का काम पूरे साल चलता है। दिवाली पर लक्ष्मी पूजन के लिए दो-तीन माह पहले काम शुरू हो जाता है। वहीं, सावों के समय सात-आठ माह तक यह काम लगातार चलता है। जागरण, ठाकुरजी के मंदिरों आदि अन्य शुभ मांगलिक अवसरों पर इन मालाओं का बहुतायत में उपयोग किया जाता हैं। शहर के पुराने स्टेडियम के पास मुस्लिम परिवार रेशम की मालाएं बना रहे हैं। इसमें एक कारीगर एक दिन में करीब 15-20 दर्जन मालाएं बनाता है।

सही जगह मिल जाए, तो काम आसान होगा
पिछले 35 वर्षों से रेशम की माला बनाने का काम कर रहे अब्दुल करीम ने बताया कि यह काम हस्तकला उद्योग में आता है। इसमें महिला-पुरुष हाथों से काम करते है, मशीन काम में नहीं ली जाती है। अभी जहां काम कर रहे है, वह पर्याप्त नहीं है, अगर पर्याप्त सही जगह मिल जाए तो कारीगरों का काम आसान हो जाएगा।

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