8 अप्रैल 2026,

बुधवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

मंडोर में वीरों की याद में लगता था मेला, उमड़ पड़ता था मारवाड़, इस वजह से हो गया लुप्त

- कभी चला करती थी विशेष ट्रेन- पुरातन सांस्कृतिक परम्परा को पुनजीर्वित नहीं किया तो खत्म हो जाएंगे मेले

2 min read
Google source verification

सावन-भादों में उमड़ता था पूरा मारवाड़

जोधपुर/मंडोर. सावन के महीने में मंडोर में लगने वाले कई ऐतिहासिक मेले अब इतिहास के पन्नों में दफन होने लगे हैं। मारवाड़ के सपूतों की याद में लगने वाला विशाल ऐतिहासिक 'वीरपुरी का मेला' अब पिछले एक दशक से बंद हो चुका है। ऐतिहासिक 'वीरपुरी का मेला' उन तमाम शहीदों की याद दिलाता है, जिन्होंने मारवाड़ के गौरव और यहां की मातृभूमि के मान सम्मान की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा कर एक मिसाल पेश की थी। मारवाड़ की प्राचीन राजधानी मंडोर पर नागवंशी, परमार व परिहार आदि वंशों के राजाओं ने शासन किया था। उन्हीं के शासनकाल में, दिल्ली के अलाउद्दीन खिलजी, फि रोजशाह तुगलक व अल्तमश ने मंडोर पर कई आक्रमण भी किए थे। कालांतर में यहां पर बने चौथी शताब्दी के किले पर इंदा पडि़हारों ने अपना आधिपत्य कायम कर किया था, लेकिन बाद में राठौड़ शासक राव चूंडा ने इसे इंदा पडि़हरों से भेंट में प्राप्त कर लिया था, लेकिन बीच में अस्थायी तौर पर कुछ समय के लिए मेवाड़ के राणा कुंभा, औरंगजेब व शेरशाह सूरी ने भी उस पर अपना अधिकार जमाया था। सन् 1394 में 'मंडोर' राठौड़ नरेश चूंडा के अधिकार में था, जिसका किला 'भौगिदौल' के नाम से जाना जाता है। वीरपुरी का मेला जिन वीर शहीदों की याद में लगता है, उनमें रामदेव जी, गोगादेवजी चौहान, पाबू जी राठौड़, हड़बूजी व मेहाजी मांगलिया प्रमुख हैं। मारवाड़ के तत्कालीन नरेश अजीतसिंह ने यहीं पर एक विशाल चट्टान पर मारवाड़ के वीरों की विशाल मूर्तियां स्मृति स्वरूप उत्कीर्ण करवाईं, जो 'वीरों के दालान' के नाम से जानी जाती हैं। इसी दालान में लोक देवताओं की मूर्तियां हैं। यहां की मूर्तियां 18 वीं सदी की स्थापत्य कला का बेहतरीन उदाहरण कही जा सकती हैं। ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं कि यह मेला वास्तव में उन शहीदों के प्रति श्रद्धांजलि है, जिन्होंने मुगलकाल के दौरान विशेष रूप से राजस्थान पर मुगलों के आक्रमण रोके और कई वीर 'शहीद' हो गए थे।

नाग पंचमी का मेला भी खत्म

'वीरपुरी' के मेले के साथ-साथ 'नागपंचमी' का मेला लगता था। इसके बारे में कहा जाता है कि मंडोर में कभी विशाल सर्पों ने उत्पात मचाया था, तब श्रद्धालु भक्तों ने नागों की पूजा कर के मंडोर को सर्पों से मुक्त करवाया था। मंडोर उद्यान में चारों तरफ उन वीर सपूतों की ऐतिहासिक धरोहर अपने में समेटे हुए है। वहीं यह स्थल धार्मिक आस्था का केंद्र बिंदु भी है। मेले के दौरान सवेरे से ही लोगों का पहुंचना शुरू हो जाता था। पूर्व में यह मेला दो-तीन दिन तक चलता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है। प्रशासनिक सुविधाएं न होने के कारण लोगों का मेले के प्रति मोह समाप्त होने लगा है। कुछ वर्षों पूर्व तक वीरपुरी के मेले के लिए रेल प्रशासन मंडोर व जोधपुर के बीच 'विशेष ट्रेनें' संचालित करता था, किंतु लोगों की संख्या लगातार कम होने के कारण रेल सेवा बंद करनी पड़ी। आर्थिक तंगी और प्रशासन की उदासीनता की वजह से मेले के स्वरूप पर प्रतिकूल असर पड़ा है। यूं भी मंडोर में ऐतिहासिक देवल रखरखाव के अभाव में जीर्ण-शीर्ण हो रहे हैं।