
jodhpur
जोधपुर।जोधपुर एम्स में मेडिकोज को
मोटी-मोटी किताबों के बोझ से राहत दिलाने के लिए एक नया कॉन्सेप्ट शुरू किया गया
है। यहां "कॉन्सेप्ट मैपिंग" नाम से एक अनूठा रिसर्च शुरू हुआ है, जो विद्यार्थियों
का संदेह दूर करने के साथ पढ़ाई या लर्निग को आसान बनाएगा।
इसका पहला
प्रयोग 2012 बैच के पांचवें सेमेस्टर के विद्यार्थियों पर किया गया, जो क्लास टेस्ट
में सफल रहा। अब फाइनल सेमेस्टर के परिणाम आने के बाद इसे सभी मेडिकोज पर लागू करने
की तैयारी है। इस कॉन्सेप्ट को सबसे पहले 1972 में अमरीका के कोर्नेल यूनिवर्सिटी
में मनोवैज्ञानिक जोसेफ डी नोवेक ने जनरल स्टडी में प्रयोग किया
था।
उसके बाद एक अन्य मनोवैज्ञानिक डेविड असुबेल ने मेडिकल साइंस में इस
पर रिसर्च कर इसे प्रमाणित किया। 2010 में मेडिकल एज्युकेशनल के लिए इसका पब्लिकेशन
करने के बाद 2014 में भारत में जोधपुर एम्स में पहले बैच के विद्यार्थियों पर इसका
प्रयोग कर रिसर्च की शुरूआत की।
जहां इसके जादुई नतीजे सामने आए हैं। अब इस
मैथड से 2014 बैच के विद्यार्थियों को पढ़ाया जाएगा।
रूटीन मैथड से ज्यादा
नंबर आए
विद्यार्थी किताब में दिए टॉपिक को कॉन्सेप्ट मैप में दी गई
कीवर्ड से जोड़ते हुए समझता है। समझने के बाद विद्यार्थी अपने नॉलेज के अनुसार, नए
की वर्ड बनाता है, जब तक टॉपिक पूरा नहीं हो जाता।
2012 बैच के
विद्यार्थियों के एक ही ग्रुप को रूटीन मैथड और कॉन्सेप्ट मैपिंग वाले मैथड से
अलग-अलग टॉपिक पर क्लास टेस्ट लिया गया, इसमें कॉन्सेप्ट मैपिंग वालों के नंबर
रूटीन मैथड वालों से ज्यादा आए।
यह मैथड खास क्यों
इस मैथड
से विद्यार्थियों की ग्रुप स्टडी से कन्फ्यूजन दूर होते हैं इससे टॉपिक याद कम और
समझ में ज्यादा आता है। क्लास में विद्यार्थी ही पढ़ते-पढ़ाते मैप बनाते हैं।
अध्यापक सिर्फ गाइड करता है।
मैप समझने के बाद फाइनल एग्जाम में किताब
की जरूरत नहीं पड़ती। इस विधि से विद्यार्थियों की क्रिटिकल थिंकिंग पावर
बढ़ेगी
इस मैप से एक्टिव लर्निग होती है, इसमें विद्यार्थी क्लास में
सुनने के साथ कुछ बना भी रहे होते हैं। अभी 2013 बैच के विद्यार्थियों पर यह प्रयोग
शुरू किया है। - डॉ. पंकजा रवि राघव, कम्यूनिटी मेडिसन एंड फैमिली मेडिसन विभाग,
एम्स
देवेन्द्र भाटी
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