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विरासत : अपनी हालत पर आंसू बहातीं मंडोर की छतरियां

बॉलीवुड निर्माताओं के पसंदीदा स्थल जोधपुर के मंडोर उद्यान की छतरियों की हालत बुरी है। ये छतरियां किस राजा-रानी की हैं, कहीं भी शिलापट्ट नहीं लगा हुआ है।

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जोधपुर

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MI Zahir

Jun 26, 2018

Mandore Garden jodhpur

Mandore Garden jodhpur

जोधपुर/ मंडोर. फिल्म गुलामी जैसी फिल्मों में जोधपुर के मंडोर की छतरियां दर्शकों को बहुत अच्छी लगती हैं। इन दिनों परत-दर-परत गिरते ऐतिहासिक गुंबद, अपने अस्तित्व को खोजती मंडोर पंचकुण्डा की प्राचीन छतरियां दशकों से मरहम की अर्जी लिए हुए खड़ी हुई हैं। मंडोर का पचकुंडा जोधपुर राजघराने का सदियों पहले से ही प्रथम प्राचीन दाह संस्कार स्थल रहा है। यहां पर तत्कालीन शासकों ने अपने पूर्वजों की याद बनाए रखने के लिए सुंदर कलात्मक छतरियों का निर्माण करवाया था। सभी छतरियां घाटू के पत्थरों से निर्मित हैं। लगभग सभी छतरियों की स्थापत्य कला एक समान है। ये ऐतिहासिक इमारतें पर्यटन क्षेत्र में लंबे अरसे से गुमनामी के अंधेरे में हैं। मंडोर की पुरा संपदा जीर्णोद्धार के लिए बार-बार अपने अस्तित्व पर मंडराते संकट की ओर ध्यान आकर्षित करती हैं, लेकिन सरकारी स्तर पर कोई प्रयास नहीं हो रहे हैं।

बॉलीवुड की कई सुपरहिट फिल्मों की शूटिंग

बॉलीवुड की कई सुपरहिट फिल्मों की शूटिंग पंचकुण्डा की छतरियों में हो चुकी है। इनमें तेरे नाम और गुलामी सहित कई हिट फिल्मों की शूटिंग के बाद इस जगह ने सैलानियों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था। एेतिहासिक कलात्मक छतरियों को सरकारी मरहम पट्टी का इंतजार है, ताकि इनका अस्तित्व बचाया जा सके। पंचकुण्डा की छतरियों में जोधपुर की महारानी कच्छवाही सूर्यकंवर (जयपुर नरेश प्रतापसिंह की पुत्री) की स्मृति में बनाई गई छतरी स्थापत्य कला की दृष्टि से बहुत सुंदर है। छतरी में 32 खंभे लगे होने के साथ ही बीचोंबीच छोटी संगमरमर की छतरी बनाकर उसमें चरण चिह्न शिलालेख के साथ अंकित किए गए हैं। सैलानियों को छतरियों के बारे में जानकारी देने वाला कोई नहीं है। यहां यह उल्लेख भी नहीं है कि छतरियां किसकी हैं। छतरियों की देखरेख के लिए मेहरानगढ़ म्यूजियम ट्रस्ट की ओर से एक चौकीदार तैनात है।

स्थापत्य कला की दृष्टि से महत्वपूर्ण 46 छतरियां
पंचकुण्डा स्थित 46 छतरियां पुरातात्विक व स्थापत्य कला की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। कुछ छतरियां कलात्मक दृष्टि से भव्य नहीं हैं। ऐसा इसलिए संभव है कि तत्कालीन राजनीतिक जीवन में उथल-पुथल रही है, जिसने आर्थिक विपन्नताओं को जन्म दिया है। पंचकुण्डा के पास जोधपुर के शासकों की रानियों की श्मशान भूमि होने के कारण यहां पर लगातार रानियों की स्मृति में छतरियों का निर्माण होता रहा है। छतरियों के पास मारवाड़ के पूर्व शासकों राव चूण्डा, राव राणमल और राव गंगा आदि के स्मारक बने हुए हैं।

राव गांगा का देवल भी दुर्दशा का शिकार

मंडोर पंचकुण्डा स्थित छतरियों के पास नाले के किनारे पर जोधपुर के शासक रहे राव गांगा का देवल अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। हालत यह है कि गंगलाव तालाब निर्माण कर शहर के बाशिंदों की प्यास बुझाने वाले जोधपुर के चतुर्थ शासक रहे राव गांगा स्मारक के आसपास कंटीली झाडिय़ां उग चुकी हैं। देवल के दक्षिण पश्चिमी हिस्से की दीवार पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुकी है। यही नहीं, देवल के ऊपर का भाग भी टूट चुका है। स्थापत्य कला की दृष्टि से राव गांगा देवल जैसा स्मारक पूरे मारवाड़ में अन्यत्र कहीं भी नहीं हैं।

इनका कहना है

मंडोर स्थित पचकुंडा की छतरियों की देखभाल के लिए मेहरानगढ़ म्यूजियम ट्रस्ट से एमओयू हो रखा है। मंडोर के देवल की देखरेख, सफाई व सुरक्षा का जिम्मा भी उन्हीं के पास है। कोई भाग क्षतिग्रस्त होता है तो उसकी मरम्मत की जिम्मेदारी भी उन्हीं की है।

बीएल मौर्य, उप निदेशक, पुरातत्व व संग्रहालय विभाग, जोधपुर वृत्त