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आखिर कब लौटैगा मन की डोर बांधने वाले मंडोर का ‘नूर’

टेरेस गार्डन बदहाल, जेट फव्वारे बंद, श्रावण मास में लगेंगे दो मेले
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History of Mondor Fort

History of Mondor Fort

मंडोर. पौराणिक काल से रावण के ससुराल के रूप में विख्यात मंडोर सदियों पहले यहां के शासकों की सशक्त राजधानी के रूप में अपना लोहा देश-दुनिया में मनवाता रहा। इसके बाद रमणीक स्थल के रूप में इसकी ख्याति ने देसी-विदेशी पर्यटकों को आकर्षित किया। यहां का पाषाण शिल्प, कलात्मक देवल और हरियाली लोगों को सकून देती थी, लेकिन आज समूचे मारवाड़ की यह पहचान बदहाल है। मंडोर का टेरेस गार्डन अपनी पहचान खो चुका है। देखभाल के अभाव में चारों ओर कचरे के ढेर तथा ऐतिहासिक देवल आदि के समाज कंटकों के प्रयोग किए जाने की लगातार शिकायतें मिलने के बावजूद कोई निस्तारण नहीं किया जा रहा है।

भोगीशैल पर्वत मालाओं में रमणीक स्थल मंडोर नर्मदा से अफ गानिस्तान तक फैले मारवाड़ की सदियों तक राजधानी रहा, लेकिन जब से मारवाड़ की राजधानी जोधपुर शहर बनी, तभी से मंडोर के बुरे दिन शुरू हो गए। ऐतिहासिक स्थली मंडोर को एक रमणीक स्थल बनाने की दिशा में राजशाही के समाप्त होने के बाद साठ के दशक में तत्कालीन मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाडिय़ा के कार्यकाल में इसे उद्यान विभाग ने सार्वजनिक निर्माण विभाग के तहत सुंदर नहरें, फव्वारे तथा रोशनी का इंतजाम करते हुए इसे आकर्षक पर्यटन स्थल के रूप में उभारने का प्रयास किया, लेकिन जिला प्रशासन और संबंधित विभागों के अधिकारियों की बेपरवाही के कारण मन की डोर बांधने वाले मंडोर के नूर को बे-नूर कर दिया।
प्रति वर्ष मंडोर में श्रावण मास के दौरान आयोजित होने वाले वीरपुरी के मेले तथा भाद्रपद पंचमी को लगने वाले नागपंचमी के मेले के अलावा पुरुषोत्तम मास में हर तीसरे वर्ष भोगीशैल परिक्रमा से लौटने वाले यात्रियों का सुकून भरा पड़ाव भी मंडोर में होता रहा है। प्राचीन पुरावैभव युक्त रमणीक स्थल की उपेक्षा के चलते इसकी हरियाली गायब होती जा रही है। उद्यान की नहरें सूखी पड़ी है, सुंदर नहरों की सीमेंट व टाइलें उखड़ चुकी हैं तथा इनमें लगे फव्वारों को संचालन करने वाले मशीनें जंग खा चुकी है। जेट फव्वारे को चलते हुए देखे अरसा बीत चुका है। तत्कालीन यूआईटी की ओर से तीन दशक पूर्व बच्चों के लिए लगाउ झूले कबाड़ी की दुकान जैसा नजारा बना चुके है।