विश्व का एक बहुचर्चित पर्यटन स्थल है जोधपुर का उम्मेद भवन पैलेस। यह एक भव्य महल है। यह दुनिया के सबसे बड़े निजी महलों में से एक है। इसका नाम महाराजा उम्मेदसिंह के पौत्र ने दिया था जो वर्तमान में मालिक हंै। इसे छीतर पैलेस के नाम से भी जाना जाता है। यह पैलेस सन 1943 में बनकर तैयार हुआ था। यह महल सुनहरे पीले बलुआ पत्थर से बनाया गया था। इसमें मकराना संगमरमर का भी इस्तेमाल किया गया।
वर्तमान में उम्मेद भवन पैलेस के मारवाड़ राजघराने से जुड़े पूर्व सांसद गजसिंह इसके मालिक हैं। इस पैलेस के तीन भाग हैं , एक लग्जऱी ताज होटल जो (1972) से है ,एक शाही परिवार के लिए और एक संग्रहालय है। संग्रहालय के खुलने का समय सुबह 9 बजे से शाम 5 तक। यहां एक दीर्घा भी है जहाँ पर कई चीजें देखने को मिलती हैं। यह भवन देसी विदेशी सैलानियों को पसंद आता है।
देश और दुनिया की सेलिब्रिटीज यहां रॉयल बर्थ डे, सगाई और शादी समारोह करना अपनी शान समझते हैं। यहां नामी उद्योगपति मुकेश अंबानी की पत्नी नीता अंबानी का बर्थ डे मनाया गया था। सेलिब्रिटीज की यह सूची बड़ी लंबी है।
धीरे धीरे बनाया, ताकि रोजगार मिलता रहे
यह बनाने के लिए तत्कालीन महाराजा उम्मेद सिंह ने आर्किटेक्ट के रूप में हैनरी वॉन लेन्चेस्टर को नियुक्त किया। लैनचस्टर सर एडविन लुटियन के समकालीन था जिन्होंने नई दिल्ली सरकार के परिसर की इमारतों की योजना बनाई थी। उन्होंने नई दिल्ली के भवन परिसर की तर्ज पर उम्मेद भवन पैलेस में गुंबदों और स्तंभों का निर्माण किया। यह महल पश्चिम और भारतीय वास्तुकला का एक शानदार नमूना है। इस महल को धीमी गति से बनाया गया था क्योंकि इसका प्रारंभिक उद्देश्य यहां के अकालग्रस्त किसानों को रोजगार देना था। इसकी नींव का पत्थर सन 1929 में रखा गया था।
2,000 से 3,000 लोग इसे बनाने में लगे थे
लगभग 2,000 से 3,000 लोग इसे बनाने में लगे थे। हालांकि, महाराजा को महल का वास्तविक कब्जा 1 9 43 में पूर्ण होने के बाद ही मिला था, जो भारतीय स्वतंत्रता काल के बहुत करीब था। तब एक महंगी परियोजना शुरू करने के लिए आलोचना हुई थी, लेकिन जोधपुर के नागरिकों को अकाल की स्थिति का सामना करने में मदद करना इसका मुख्य उद्देश्य था। महल के निर्माण की अनुमानित लागत 11 मिलियन थी। जब 1 9 43 में इसके स्वणजडि़त दरवाजे खोल दिए गए तो इसे दुनिया के सबसे बड़े महलों में से एक शुमार किया गया।
सूखे के बाद आई बहार
उम्मेद भवन पैलेस के निर्माण का इतिहास एक संत के अभिशाप से जुड़ा हुआ है, जिन्होंने कहा था कि सूखे की अवधि राठौड़ वंश का अच्छा शासन काल रहेगी। इस प्रकार सर प्रताप के लगभग 50 साल के शासनकाल के बाद जोधपुर को लगातार तीन वर्षों तक 1920 के दशक में सूखे और अकाल की स्थिति का सामना करना पड़ा। अकाल की स्थिति में आने वाले क्षेत्र के किसानों ने तत्कालीन महाराजा उम्मेद सिंह से सहायता मांगी, वे जोधपुर में मारवाड़ के 37 वें राठौड़ शासक थे। किसान चाहते थे कि उम्मेदसिंह उन्हें कुछ रोजगार दें ताकि वे अकाल की स्थिति से बच सकें। तब महाराजा उम्मेदसिंह ने किसानों की मदद के लिए एक भव्य महल का निर्माण करने का फैसला किया। जो आज उम्मेद भवन पैलेस के नाम से जाना जाता है।
चुनी एेसी जगह, बनाई रेलवे लाइन
उम्मेद भवन पैलेस बनाने के लिए छीतर की पहाड़ी को चुना गया था। क्यों कि तब यह स्थल जोधपुर की बाहरी सीमा में छीतर की पहाड़ी के रूप में जाना जाता था। जिसे अब महल के रूप में जाना जाता है। यहां आसपास पानी की आपूर्ति उपलब्ध नहीं थी और शायद ही कोई पेड़ पहाड़ी ढलान चट्टानी थे। आवश्यक भवन निर्माण सामग्री नजदीक रखे गए थे। क्योंकि बलुआ पत्थर खदान बहुत दूरी पर थे। चूंकि महाराजा अपनी परियोजना को सफल बनाने के लिए दूरदृष्टि रखते थे, इसलिए उन्होंने भवन सामग्री के परिवहन के लिए खदान स्थल पर एक रेलवे लाइन बनाई। साइट पर मिट्टी ढोलने के लिए गधे रखे गए थे। रेलवे की ओर से पहुंचाए जाने वाले बलुआ पत्थर साइट पर बड़े-बड़े ब्लॉकों में इंटरलॉकिंग जोड़ों के साथ तैयार किए गए थे ताकि वे मोर्टार के उपयोग के बिना रखे जा सकें और इस प्रकार एक अदभुत इमारत बना सकें।