script'... if I don't cry then what should I do? | '...मैं रोऊं नहीं तो और क्या करूं ? | Patrika News

'...मैं रोऊं नहीं तो और क्या करूं ?

'तीखा व्यंग्य

जोधपुर

Published: November 18, 2021 02:00:59 am

ज हमारा कलक्ट्रेट की ठीक सामने महावीर उद्यान में जाना हुआ। जैसे ही यहां 100 फीट ऊंचे तिरंगे के पोल के सामने खड़े हुए, अचानक से आवाज आई। भैय्या...क्यों आए हो यहां? इधर-उधर देखा, कोई नजर नहीं आया। तिरंगे का पोल बोला...इधर-उधर क्या देखते हो, मेरी तरफ देखो, मेरी तरफ। आवाज में 'तीखा व्यंग्यÓ था। बोला...यहां क्या देखने आए हो? अब यहां बचा ही क्या है? बस यहां मैं ही तो खड़ा हूं। सौ फीट ऊंचा तिरंगा तो अब बस 26 जनवरी व 15 अगस्त की शान रह गया है। या कभी-कभार फहरा दिया जाता है तो मैं भी उन दिनों खूब इतराता हूं। बुरा मत मानना, भैय्या...सच तो यह है कि मुझे खुद को ही बिना तिरंगा 'नंगाÓ दिखते हुए शर्म आने लगी है, लेकिन जिम्मेदार नगर निगम के पास तो शायद यह शर्म भी नहीं बची है। हमारी नजर पोल के सबसे ऊपर तक चली गई।
हमने कुछ बोलने के लिए मुंह खोला ही था, कि पोल फिर बोल पड़ा। इतना ऊपर क्या देखते हो, जरा नीचे भी झांक लो। अब तो न तो ऊपर शान है, और न ही आन। नीचे तो मैं पूरा हूं वीरान। उसकी आवाज में इस बार मायूसी भरे शब्द थे। पोल बोला...नीचे आपकी चारों तरफ जहां तक नजर जाती है, वहां सिर्फ मेरे अवशेष हैं।
'...मैं रोऊं नहीं तो और क्या करूं ?
'...मैं रोऊं नहीं तो और क्या करूं ?
चलो आपको मेरे जन्म के बारे में बता देता हूं। करीब साढ़े सात साल पहले 25 जनवरी 2014 को मेरा जन्म हुआ। उस दिन को जब मैं याद करता हूं तो मेरे सहारे 100 फीट ऊं चा तिरंगा लहरा रहा था। स्वागत में राष्ट्रगीत व राष्ट्रगान तक गाए जा रहे थे। मेरे नीचे लाखों रुपए खर्च कर फाउंडेशन बनाया गया। और अब देखो, तिरंगा तो बस 365 दिन में कुछ दिन ही नजर आता है, लेकिन मेरे चारों तरफ अब हरियाली नहीं बदहाली रहती है, टूटे पोल नजर आते हैं, जालियां बिखर गई हैं, सफेद गोल पत्थर गायब हो गए हैं, फाउंटेन तो बस दिखावटी रह गए हैं। शिलापट्ट पर केवल धूल ही धूल नजर आती है। कोई यहां मेरी सुध लेने नहीं आता। पहले कुछ लोग मेरे आगे खड़े होकर फोटो व सेल्फी लेते थे। तो मैं भी खुश होता था, लेकिन अब कोई फटकता तक नहीं है। यूं तो मेरे सामने ही जिला कलक्ट्रेट है। इसके बाद भी ये बदहाली। 'अब आप ही बताओ, मैं रोऊं नहीं तो और क्या करूं...?Ó पोल बहुत कुछ कहना चाहता था। उसके आंसू भी बस निकलने वाले थे। वो और कुछ कहता, उससे पहले ही हम वहां से निकल लिए।
-राजेश दीक्षित

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