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आईआईटी, सपनों की ऐसी उड़ान...जिसने हर किसी के विषय को विज्ञान बना दिया है। हो भी क्यों नहीं, आखिर ये संस्थान निर्माण की इतनी संभावनाएं जो रखते हैं। बीटेक की डिग्री तो होती है, साथ ही साथ सीखने को इतना बड़ा सागर है, यहां ऐसे लोगों से मिलने का मौका है जो हमारे लिए प्रेरणा के स्रोत रहे हैं। ऐसा प्लेटफॉर्म जिस पर खड़े होने से ही जीवन कुछ ऊंचाई पर लगने लगता है। केंद्र सरकार ने इन संस्थानों की संख्या बढ़ाने का एक शानदार निर्णय लिया और 2008 में इनकी संख्या को 7 से बढ़ा कर 15 कर दी गई। इसी में से एक रही हमारी आईआईटी।
वहीं 2008 में आईआईटी कानपुर कैम्पस में शुरुआत होने के 2 वर्ष बाद 2010 में आईआईटी ने जोधपुर की शिक्षा में एक नया आयाम स्थापित किया। लेकिन आज भी लगभग 7 वर्ष बीत जाने पर भी जो एहसास जोधपुरवासियों को होना चाहिए था, वो नहीं है। आईआईटी आने के बाद से माना जा रहा था कि अब इन संस्थानों में जाने वाले विद्यार्थियों में जोधपुर से एक बड़ी लिस्ट होगी, किन्तु इसके सार्थक परिणाम अभी कोसों दूर हैं। कोचिंग संस्थानों की संख्या जरूर बड़ी है, किन्तु उसके परिणामस्वरूप विद्यार्थियों की रैंक में बहुत इजाफा हुआ हो, ऐसा दिखाई नहीं देता।
अभी भी कोटा पर भरोसा
जोधपुर के विद्यार्थियों का भरोसा अभी भी कोटा के कोचिंग संस्थान में ही दिखाई देता है। इसका एक बड़ा कारण तो इस शहर की प्रारंभ से कॉमर्स के प्रति रुचि भी है। साथ ही साथ कोचिंग और विद्यालयों का एक दूसरे से दूरी बनाए रखना भी है। यह कहना तो ठीक नहीं होगा कि जोधपुर को कोटा की तरह का वातावरण देना है, क्योंकि इसने बड़ी डिग्री के नाम पर बचपन को तो पीछे धकेल ही दिया है, किन्तु ऐसे कई पहलू हैं जिन पर ठीक से विचार कर हालात श्रेष्ठ बनाए जा सकते हैं।
इस तरफ बढ़ाने होंगे कदम
सर्वप्रथम तो विद्यालयों को पहल करनी होगी। वे इन संस्थानों से दूरी के स्थान पर सबंधों को मजबूती दें, ताकि समय की बर्बादी रोकी जा सके। विद्यालय ही आईआईटी के प्राध्यापकों से या यहां पढ़ रहे सीनियर विद्यार्थियों के साथ समय-समय पर अपने छात्र छात्राओं से रूबरू करवाए। ये कार्यक्रम छोटी कक्षाओं से भी प्रारंभ किये जा सकते हैं। हालांकि ध्यान इस बात का रखना जरूरी है कि इस प्रक्रिया में बच्चों को बचपन से बहुत अधिक समझौता नहीं करना पड़े।
कोचिंग संस्थान भी विद्यार्थियो का समय ध्यान रखते हुए विद्यालय से समन्वय का प्रयास करें। आईआईटी के लिए भी यह होना चाहिए कि स्थानीय शिक्षण संस्थानों के साथ उनकी आवश्यकता के अनुसार अपने कुछ प्राध्यापकों का समय का निर्धारण करें। यह विद्यार्थियों की ऐसी कई जिज्ञासाओं का समाधान करेगा, जो असंतुलन की स्थिति पैदा करते हैं। साथ ही साथ विद्यार्थियों का शहर के प्रति विश्वास पैदा करेगा। यही विश्वास कुछ समय में यहां के विद्यार्थियों को इस दौड़ में बहुत आगे बढ़ा देगा।
बढऩे की ललक
जोधपुर के छात्रों में आगे बढऩे की ललक भी है और काबिलियत भी। उचित मार्गदर्शन का अभाव जरूर है। विद्यार्थी, अभिभावक, विद्यालय व कोचिंग के तालमेल से समस्या का बहुत हद तक समाधान हो सकता है। कभी-कभी हमें लगता है कि हम भी इसमें कुछ योगदान दे सकते हैं किन्तु इसके लिए भी विद्यालयों को ही पहल करनी होगी। हालांकि अच्छी रैंक आना इस बात पर भी निर्भर करेगा कि तैयारी कितने समय की गई। मैं इस बात का भी बहुत हितैषी नहीं हूं कि उसके कल को संवारने के लिए उसे अपना आज पूरे तरीके से खोना पड़े। यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि आईआईटी अच्छा संस्थान है किन्तु जीवन की परिभाषा नहीं हो सकता।
- डॉ. विवेक विजय, असिस्टेंट प्रोफेसर, आईआईटी जोधपुर
Published on:
08 May 2017 06:56 pm
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