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मोर के सुंदर पंख ही बने उसके खुद के जानी दुश्मन

व्यापार की छूट का फायदा उठा रहे शिकारी

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illegal hunting of national bird peacock practised in Jodhpur

भगवान श्रीकृष्ण के माथे पर सजने वाले मोरपंख अपने खूबसूरत और मनमोहक रंगों से सबका मन मोह लेते है, लेकिन इसी पंख के कारण राष्ट्रीय पक्षी मोर खतरे में हंै। मोर की सुंदरता के कारण ही इसे वर्ष 1963 में भारत का राष्ट्रीय पक्षी घोषित किया गया । खूबसूरत पंख के लालच में शिकारी मोर का शिकार कर इनका अस्तित्व समाप्त कर देने पर तुले हैं। वैसे तो साल भर ही मोर पंखों की मांग रहती है, लेकिन कुछ खास त्योहार जैसे नवरात्रि, दिवाली पर मोरपंखों की मांग बढ़ जाती है।

illegal hunting of national bird peacock practised in Jodhpur

कई लोग पूजन के साथ घरों के गेस्ट रूम को सजाने के लिए भी सुंदर पंखों का प्रयोग करने लगे हैं। कुछ अशिक्षित लोग मोरों का शिकार मांस के लिए भी करते है। मोरों के शिकार के लिए शिकारी उन्हें जहरीला दाना डालते हैं। फि र मरे हुए मोर से आसानी से पंख निकालकर बेचते हैं।

illegal hunting of national bird peacock practised in Jodhpur

ऐसे में यह पहचान करना मुश्किल हो जाता है कि कौन से पंख प्राकृतिक रूप से झड़े हैं और कौन से शिकार के बाद निकाले गए हैं। राजस्थान में मोरों के शिकार का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। हाल ही में नागौर जिले के मकराना में 50 मोर मृत अवस्था में मिले थे।

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कानूनन मोर के शिकार के दोषी को 1 से 7 वर्ष के कारावास का प्रावधान है। भारत सरकार के केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने भी इन पर ध्यान देते हुए 10 मई 2010 कानून में संशोधन कर मोरपंखों से बनी वस्तुओं के घरेलू व्यापार पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव भी तैयार किया था।

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मोर को वर्ष 1963 में राष्ट्रीय पक्षी का दर्जा दिए जाने के बाद भी आज तक मोरों को कोई भी वैज्ञानिक विधिवत गणना नहीं की गई है।

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मोरनी धूसर रंग की होती है तथा नर मोर की तरह मादा के सजावटी पंख नहीं होते हैं। इसका जीवनकाल 10 से 25 वर्ष तक होता है। मादा मोर साल में दो बार अंडे देती है, जिनकी संख्या 6 से 8 तक रहती है। मोर घोंसला नहीं बनाते, बल्कि मैदान में ही अंडे देते हैं।

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भारत के राष्ट्रीय पक्षी मोर को वन्यजीव सुरक्षा कानून 1972 के अनुसूची प्रथम में रखकर उचित संरक्षण दिया गया है, लेकिन घरेलू बाजार में मोरपंखों के व्यापार पर छूट मिली हुई है। वन्यजीव सुरक्षा कानून 1972 के सेक्शन 43 ए और 44 के तहत मोर के शिकार, पालन और इसके पंखों के निर्यात पर प्रतिबंध हैं। प्राकृतिक रूप से झड़े मोरपंखों से बनी सजावटी वस्तुओं या अन्य सामानों के निर्माण तथा खरीद-फ रोख्त पर घरेलू बाजार में व्यापार की छूट है।