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भारत-पाक बॉर्डर पर पश्चिमी ‘सरहदों का प्रहरी‘ है राजस्थान का ये जिला, पाकिस्तान भी मान चुका है ‘लोहा‘

1965 की लड़ाई से लेकर 1999 में कारगिल वार के समय भी पश्चिमी सरहद को दुश्मनों से महफूज रखा था...

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जोधपुर।

वर्ष 1971 में भारत और पाकिस्तान की जंग के दरमियान देश की पश्चिमी सीमा के उस ओर तैनात पाकिस्तानी मिलिट्री के सिपेहसालारों ने अपने सैनिकों से कहा था, जैसलमेर में नाश्ता करेंगे....लंच जोधपुर में करेंगे... और डिनर दिल्ली में। आज हम आपको उसी जोधपुर के बारे में बताते हैं जिसने 1965 की लड़ाई से लेकर 1999 में कारगिल वार के समय भी पश्चिमी सरहद को दुश्मनों से महफूज रखा था।

राजस्थान में थार मरुस्थल का प्रवेश द्वार कहीं जाने वाली सूर्यनगरी सामरिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है। यहां भारतीय वायुसेना का बहुत बड़ा एयरबेस है जहां लड़ाकू विमानों की 3 स्क्वाड्रन और हेलीकॉप्टर की स्क्वाड्रन तैनात है। एयरवेज पर चौथी पीढ़ी के विमान सुखोई-30 एमकेआई के साथ मिग-27 अपग्रडेड विमानों की स्क्वाडर्न है जो कुछ ही मिनट में बॉर्डर पर जाकर दुश्मन पर हमला बोलने की काबिलियत रखती है। मिग 27 विमान जा ग्राउंड अटैक फायरिंग में बेहतर है वही मल्टीरोल फाइटर विमान सुखोई अन्य विमानों की सुरक्षा करने के साथ-साथ दुश्मन पर ब्रह्मोस मिसाइल से भी हमला कर सकता है।

मिलिट्री का भी बहुत बड़ा बेस
जोधपुर में मिलिट्री का भी बहुत बड़ा बेस है। यहां आर्मी की 12 कोर यूनिट तैनात है जिसमें करीब डेढ़ लाख तक सैनिक है। इसे कोणार्क कोर या डेजर्ट कोर भी कहते हैं। इसका एरिया राजस्थान से लेकर अहमदाबाद तक लगता है। कोणार्क कोर की योग्यता का इस बात से प्रमाण लगाया जा सकता है कि देश के पूर्वी छोर पर अंडमान निकोबार द्वीप समूह में भी कोणार्क कोर की ही टुकड़ी तैनात है जिस का संचालन जोधपुर से किया जाता है।

1965 की लड़ाई के दौरान पूरा दारोमदार जोधपुर पर ही था
इसके अलावा जोधपुर में सीमा सुरक्षा बल के राजस्थान फ्रंटियर का मुख्यालय भी है जिसकी क्षेत्र श्री गंगानगर से लेकर जैसलमेर बॉर्डर तक है। हाल ही में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल का रिक्रूट ट्रेनिंग सेंटर भी जोधपुर में शुरू हो गया है। ऐसे में जोधपुर सामरिक और सुरक्षा की हर दृष्टि से देश में काफी महत्व रखता है। पाकिस्तान के साथ टकराव में योगदान वर्ष 1965 की लड़ाई के दौरान आर्मी और एयरफोर्स ने जोधपुर से ही अपने स्ट्राइक लॉन्च किए थे। उन दिनों बाड़मेर जैसलमेर सहित अन्य सरहदी इलाकों में सुविधाएं नहीं होने की वजह से पूरा दारोमदार जोधपुर शहर पर ही था।


1971 की लड़ाई के दौरान सुरक्षित रखी पश्चिमी सरहद
वर्ष 1971 की लड़ाई के दौरान तो जोधपुर की वजह से ही पश्चिमी सरहद सुरक्षित रह सकी। उस समय यहां मिग विमानों की स्क्वाडर्न थी। आर्मी को सपोर्ट देने के लिए मिग विमानों ने सीमा पार से आए पाकिस्तानी टैंको पर जबरदस्त गोलाबारी की थी। इससे दुश्मन के छक्के छूट गए। पाकिस्तान के कुछ टैंक को सेना ने अपने कब्जे में लेकर जोधपुर सहित अन्य स्थानों पर आम लोगों की प्रदर्शनी के लिए भी लगा रखा है। वर्तमान में जोधपुर की सुरक्षा करने के लिए जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर और फलोदी एयरबेस पर भी वायु सेना तैनात है। बड़ा हमला होने की स्थिति में जोधपुर ही पश्चिमी सरहद पर बड़ी भूमिका निभाएगा।

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