अंतरराष्ट्रीय धनुर्धर लिम्बाराम से विशेष बातचीत
Jitendra Rathore/जोधपुर. उदयपुर के छोटे से गांव सरादिता में जन्मे अंतरराष्ट्रीय लिम्बाराम बचपन में गांव के दोस्तों के साथ शर्तों पर नारियल व खजूर को निशाना बनाते थे, उन्हें नहीं पता था कि एक दिन वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीरंदाजी में पहचान बनाएंगे, लेकिन बचपन के इस शौक ने उनके अंतरराष्ट्रीय मंच पर जाने की राह खोल दी। यह बात अंतरराष्ट्रीय धनुर्धर लिम्बाराम ने राजस्थान पत्रिका को विशेष बातचीत में बताई। लिम्बाराम ने बताया कि बचपन से वे घर में दादा व परदादा के धनुष व भाले देख बड़े हुए, जिससे उनका तीरंदाजी में बचपन से ही रुझान बढ़ गया। पिता को तीर-धनुष बनाते देख उन्होंने धनुष व तीर बनाना सीखा और अपने बड़े भाई से तीरंदाजी की तालीम ली। लिम्बाराम ने बताया कि बचपन में वे निशानेबाजी के साथ-साथ गांव में दोस्तों के साथ कपड़े से बनी फुटबॉल से खेलते थे।
15 वर्ष की उम्र में पहुंचे साई
लिम्बाराम ने बताया कि पन्द्रह से सौलह वर्ष की उम्र में उनका चयन स्पोट्र्स ऑथोरिटी ऑफ इंडिया ने किया। इसके बाद दो साल तक उन्होंने घर से दूर रहकर प्रशिक्षण लिया। दो वर्ष की कड़ी मेहनत के बाद लिम्बाराम नेशनल चैम्ंिपयन बने। लिम्बाराम ने महाराणा प्रताप अवार्ड, अर्जुन पुरस्कार व एशियाई चैम्पियनशिप बीजिंग में स्वर्ण पदक पर निशाना लगाकर कई मैडल देश के नाम किए। लिम्बाराम राजस्थान के मुख्य तीरंदाजी कोच भी रहे व २०१० कॉम्नवेल्थ गेम्स के लिए लिम्बाराम को नेशनल तीरंदाजी कोच भी बनाया गया। जयपुर में लिम्बाराम के दो तीरंदाजी प्रशिक्षण शिविर में ८० से ज्यादा विद्यार्थी तीरंदाजी के गुर सीख रहे हैं।
जब गोल्ड से चूक गए लिम्बाराम
लिम्बाराम ने गोल्ड से चूक जाने का एक किस्सा याद करते हुए बताया कि १९९२ बारसिलोना ओलम्पिक में धनुष की तकनीकी खामी के कारण वे गोल्ड पर निशान लगाने से चूक गए। उन्होंने बताया कि उन्हें धनुष की तकनीकी खामी तब पता चली, जब तीरंदाजी शुरू हो गई। वहां इतना समय भी नहीं दिया जाता था कि धनुष को ठीक से सेट कर पाए। इसलिए वे इस ओलंपिक में देश के लिए पदक लाने से चूक गया। लेकिन इस हार से उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और देश के लिए कई पदक पर निशाने साधे।