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मदर्स डे विशेष : बेटी का डॉक्टर बनने का सपना साकार करने को मां बनी आंखें

मदर्स-डे पर आज हम आपको शहर की उस मां की संघर्ष की कहानी से रूबरू करवाते हैं। जिसके बेटी की एक आंख आई हेमरेज से खराब हो गई। दूसरी आंख भी खराब न हो जाए इसलिए डॉक्टर ने आगे न पढऩे की चेतावनी दी। लेकिन बेटी का डॉक्टर बनने का सपना धुमिल न हो जाए इसलिए उसकी मां उसके साथ बैठकर उसे किताबें पढ़कर सुनाती रही।

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मदर्स डे विशेष : बेटी का डॉक्टर बनने का सपना साकार करने को मां बनी आंखें

ओम टेलर/जोधपुर. मदर्स-डे पर आज हम आपको शहर की उस मां की संघर्ष की कहानी से रूबरू करवाते हैं। जिसके बेटी की एक आंख आई हेमरेज से खराब हो गई। दूसरी आंख भी खराब न हो जाए इसलिए डॉक्टर ने आगे न पढऩे की चेतावनी दी। लेकिन बेटी का डॉक्टर बनने का सपना धुमिल न हो जाए इसलिए उसकी मां उसके साथ बैठकर उसे किताबें पढ़कर सुनाती रही। आखिरकार उनका संघर्ष रंग लाया और एक दिन वो भी आया जब उनकी लाडली डॉक्टर बन घर पहुंची। बात वर्ष 2004 की है।

शहर के रेलवे कॉलोनी निवासी गंगासिंह परिहार (कार्यालय अधीक्षक रेलवे कार्यशाला) की नौ साल की बेटी एकता परिहार की एक आंख आई हेमरेज से खराब हो गई। वर्ष 2004 से वर्ष 2009 तक जोधपुर में एकता का एमडीएम में इलाज चला। वह आईसीयू में रही। दूसरी आंख न चली जाए, इसलिए चिकित्सक ने आगे न पढऩे की चेतावनी दी, लेकिन चिकित्सकों के बीच रहते-रहते एकता ने भी मन बना लिया कि वह डॉक्टर बन लोगों की सेवा करेगी।

बेटी का यह सपना धुमिल होते देख मां नीलू परिहार एक-दो नहीं कई सालों तक उसे किताबें पढ़-पढ़कर एकता को सुनाती रही। इस दौरान एकता ने वर्ष 2008 में प्राइवेट दसवीं व वर्ष 2010 में बारहवीं की परीक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। वर्ष 2012 में एकता ने पीएमटी भी उत्तीर्ण कर लिया। आज वह जयपुर के राजस्थान हॉस्पिटल में दंत चिकित्सक के रूप में अपनी सेवाएं दे रही है।

एक आंख खोई, लेकिन मां ने हौंसला नहीं खोने दिया
एकता परिहार कहती है कि आई हेमरेज से एक आंख चली गई। बाद में कॉस्मेटिक आई लगाई गई। वह मानसिक रूप से काफी टूट गई थी। ऐसे समय में मां ने संभाला, हिम्मत दी जिससे वह अपना डॉक्टर बनने का सपना पूरा कर सकी। एकता का कहना है कि युवाओं अपने परिजनों का सम्मान करना चाहिए क्योंकि मुश्किल के समय सिर्फ वे ही काम आते है।

इलाज के लिए घर तक बेचना पड़ गया था
पति रेलवे में सरकारी नौकरी पर थे। ज्यादा आमदनी नहीं थी। बेटी का करीब छह साल तक इलाज चला। जिसमें लाखों रुपए खर्च हुए। जिसके चलते मकान व भूखण्ड तक बेचना पड़ा। लेकिन आज पूरा परिवार खुश है कि एकता डॉक्टर बन गई हैं ओर बिलकुल स्वस्थ है। इससे ज्यादा हमें कुछ नहीं चाहिए।