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अमित दवे/जोधपुर. कभी लाखों लोगों को रोजगार देने वाला हैण्डलूम (हथकरघा) व टेक्सटाइल उद्योग संकट के दौर से गुजर रहा है। प्रदेश में 90 फ ीसदी हैण्डलूम व टेक्सटाल इकाइयां मंदी में चल रही है। मांग कमजोर होने से मिलों को उत्पादन कम करना पड़ रहा है। उद्यमी हैण्डलूम व टेक्सटाइल मुश्किल से चला रहे हैं। त्योहारों व शादियों के सीजन के बावजूद पहली बार इतनी मंदी देखने को मिल रही है। जिसका असर बाजार में दिख रहा है। जोधपुर की बात करें तो पिछले करीब डेढ साल में हैण्डलूम व टेक्सटाइल में काम करने वाले 10 हजार आर्टिजन बेरोजगार हो गए हैं। वहीं सालावास का प्रसिद्ध दरियों का कारोबार भी मंदा है। आर्टिजन व मजदूर अब दूसरे उद्योगों में रोजगार की तलाश कर रहे हैं।
जीएसटी के बाद से हालात बिगड़े
हैण्डलूम में बिकने वाले हस्तनिर्मित वस्तुओं पर जीएसटी लगने के बाद से ही मंदी की मार झेल रहा है । राज्य में हैण्डलूम उद्योग पहले टेक्स फ्री था। अब जीएसटी के तहत अलग-अलग हस्तनिर्मित वस्तुओं पर अलग स्लेब में टेक्स लग रहा है । इससे हैण्डलूम में मिलने वाले प्रोडक्टस महंगे हो गए हैं।
एनजीटी की सख्ती का असर
उद्योग पर एनजीटी की सख्ती का असर भी है। कुछ इकाइयां बंद पड़ी हैं। डाइंग की रेट भी बढ़ गई है। कपड़े की उत्पादन लागत बढ़ती जा रही है। कमजोर मांग होने के कारण कपड़े के दाम नहीं बढ़ पा रहे हैं। कॉटन व पॉलिस्टर यार्न की मांग भी काफ ी कमजोर चल रही है।
बुनकर भी हो गए कम
वर्तमान में अधिकांश लोग ऑनलाइन शॉपिंग को तरजीह दे रहे हैं। कुछ बड़ी कंपनियां यहां के स्थानीय आर्टिजन्स से उनके द्वारा बनाई गई हैण्डलूम प्रोडक्ट्स की सप्लाई मामूली दर पर लेकर ऑनलाइन पर अच्छे दामों में बेच रही हैं। इससे बुनकरों की आर्थिक स्थिति दयनीय होती जा रही है। कभी 30 हजार से अधिक बुनकर इस उद्योग से जुड़े थे। पांच हजार परिवार की रोजी-रोटी इससे चलती थी। अब केवल 10 हजार ही बुनकर बचे हैं।
मंदी ने बाजार की कमर तोड़ दी है। निर्यात में मांग कमजोर होने पर घरेलू मार्केट से काम चल जाता था। इस बार घरेलू मार्केट में भी मांग नहीं निकल पा रही है।
मदनलाल, हैण्डलूम आर्टिजन
हैण्डलूम पारम्परिक उद्योग है। साथ ही, जोधपुर में टेक्सटाइल का भी अच्छा काम है लेकिन जीएसटी व एनजीटी की कार्यवाहियों से उद्योग प्रभावित हुआ है।
वरुण धनाडिय़ा, युवा उद्यमी
Published on:
24 Dec 2019 04:19 pm
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