
dhinga gavar celebration in jodhpur
महिला सशक्तिकरण को लेकर जोधपुर में मनाए जाने वाले अनूठे धींगा गवर मेले का आयोजन केवल सूर्यनगरी जोधपुर में ही नहीं बल्कि वीर प्रसूता धरा मेवाड़ में भी होता है। उदयपुर के महाराणा राजसिंह अव्वल ने अपनी छोटी महारानी को प्रसन्न करने के लिए पारम्परिक रीति के खिलाफ जाकर धींगा गवर को लोकपर्व के रूप में प्रचलित किया था। तब से धींगा गणगौर मेला प्रचलित हुआ।
यह छोटी महारानी और कोई और नहीं बल्कि जोधपुर की राठौड़ी राजकुमारी थी जिसने अपनी जिद के कारण धींगा गवर मेले की परम्परा शुरू की। उसी रानी ने जोधपुर में पीहर प्रवास के दौरान परम्परा को आगे बढ़ाया जो त्योहार के रूप में प्रचलित हुआ। जोधपुर में पिछले पांच दशक से धींगा गणगौर पूजन को उत्सव के रूप में मनाए जाने लगा है। धींगा गणगौर का पूजन जोधपुर में कुंवारी कन्याएं नहीं करती हैं, लेकिन सुहागिनों के साथ विधवा महिलाएं पूजती हैं।
क्या है धींगा का मतलब
धींगाई का अर्थ जबरदस्ती है। संस्कृत के धिंग (हठपूर्वक) से ही धींगा शब्द बना है। मेवाड़ के इतिहास पर सन् 1884 तक के महाराणाओं के विस्तृत वृत्तांत व आनुषंगिक सामग्री सहित आधारित 'वीर विनोद' ग्रंथ में महाराणा सज्जनसिंह के आश्रित राजकवि कविराज श्यामलदास ने मेवाड़ में धींगा गणगौर मनाए जाने का उल्लेख किया गया है।
राजस्थान के इतिहास पर आधारित 2716 पृष्ठ के चिरस्मरणीय ग्रंथ के पृष्ठ संख्या 123 पर लेखक व महाराणा सज्जनसिंह के आश्रित राजकवि कविराज श्यामलदास ने वैशाखी तीज पर उदयपुर में धींगा गणगौर का त्योहार मनाने का उल्लेख किया है। यह उत्सव ठीक होली के दूसरे दिन चैत्रकृष्ण प्रतिपदा से चैत्रशुक्ल तृतीया तक मनाए जाने वाले गणगौर उत्सव की तरह ही होता है।
जोधपुर में अलग-अलग मत
सुयोग्य वर की कामना और अखंड सुहाग के लिए गणगौर का परम्परागत पूजन तो पूरे प्रदेश में होली के दूसरे दिन से चैत्रशुक्ल तृतीया तक होता है, लेकिन इसके तुरंत बाद केवल जोधपुर में ही एक पखवाड़े तक धींगा गवर पूजी जाती हैं। इसे लेकर जोधपुर में अलग-अलग मत हैं। जोधपुर में एक मत यह भी है कि धींगा गवर भीलणी के रूप में मां पार्वती का स्वरूप हैं। गवर पूजन में शिव-पार्वती के हंसी-ठिठोली की प्रसंग कथा भी है।
कहा जाता है भगवान शिव रूप बदल कर पार्वती से हंसी ठिठोली के प्रत्युत्तर में मां पार्वती ने भी वन कन्या का रूप धर कर शिव से हंसी ठिठोली की थी। सूर्यनगरी में करीब पांच दशकों से महिला सशक्तिकरण के उद्देश्य से मनाए जाने वाले अनूठे धींगा गवर लोकपर्व का सबसे सुखद पक्ष यह है कि इसमें विधवा महिलाओं को भी गवर पूजने का अधिकार दिया गया है।
18 वीं शताब्दी में प्रचलित
जोधपुर में 18 वीं शताब्दी के दौरान तत्कालीन महाराजा विजयसिंह और अभयसिंह के समय धींगा गवर शब्द का उल्लेख मिलता है। जोधपुर की राजकुमारी राठौड़ी रानी मेवाड़ के महाराजा राजसिंह को ब्याही गई थी जिन्होंने उदयपुर में धींगा गवर मेले के आयोजन के बाद अपने पीहर जोधपुर में भी मनोरंजन के रूप में इसका प्रचलन शुरू किया जो अब त्योहार का रूप ले चुका है। -एमएस तंवर, सहायक प्रबंधक, मेहरानगढ़ म्यूजियम ट्रस्ट

Published on:
22 Apr 2016 05:01 pm

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