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कारगिल युद्ध में शहीद कालूराम की विरांगना ने बालिका शिक्षा को बनाया मिशन, गांव के बच्चों पर खर्च की पैकेज की राशि

वीरांगना ने बालिका शिक्षा को बनाया मिशन, पैकेज की राशि से गांवों की स्कूल में बनाए कक्षा कक्ष, होनहार बालिकाओं को हर साल करती है सम्मानित

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kargil vijay diwas

कारगिल युद्ध में शहीद कालूराम की विरांगना ने बालिका शिक्षा को बनाया मिशन, गांव के बच्चों पर खर्च की पैकेज की राशि

पीआर गोदारा/भोपालगढ़.जोधपुर. हथलेवे की मेहंदी अभी फीकी भी नहीं पड़ी थी, माथे के सिंदूर की लालिमा सूखने से पहले ही संतोषदेवी का सिंदूर उजड़ गया। सुनकर सन्न रह गई कि अब उसका पति लौटकर नहीं आएगा। उसने पति का आखिरी खत पता नहीं कितनी बार खोलकर देखा और सीने से चिपका कर रोने लग जाती। शहीद कालूराम जाखड़ ने जिस सुबह अपनी मां को खत भेजा उसी दिन भारत मां का वह सपूत शहीद हो गया। वीरांगना संतोष अब गांव की बेटियों को अपना मानकर बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए जुटी हुई है।

शहीद परिवार को मिले पैकेज की राशि में से उसने अपने पीहर और ससुराल स्थित सरकारी विद्यालयों में कक्षा-कक्ष बनवाए। करीब 13 साल पहले 10 लाख रुपए खर्च कर अपने पीहर गांव बुड़किया के सरकारी विद्यालय में बेटियों की पढ़ाई के लिए दो कक्षाकक्ष का निर्माण करवाया। जबकि अपने ससुराल खेड़ी चारणान गांव के विद्यालय में भी एक कक्षाकक्ष बनाया। अब प्रतिवर्ष 15 अगस्त व 26 जनवरी को होने वाले कार्यक्रमों में इन विद्यालयों की होनहार छात्राओं को सम्मानित भी करती है।

पैर शरीर से अलग, लेकिन दुश्मनों को मार गिराया
भोपालगढ़ क्षेत्र के खेड़ी चारणान गांव निवासी कालूराम जाखड़ पुत्र गंगाराम जाखड़ 28 अप्रेल 1994 को भारतीय सेना की 17 जाट रेजीमेंट में सिपाही के पद पर सेना में भर्ती हुए थे। चार-साढे चार साल बाद ही उनकी तैनाती जम्मू कश्मीर इलाके में हो गई थी। कुछ समय बाद ही करगिल का युद्ध शुरू हो गया था। कालूराम करगिल की पहाड़ी पर करीब 17850 फीट की ऊंचाई पर पीपुल-2-तारा सेक्टर में अपनी रेजिमेंट के साथ तैनात थे। इस दौरान 4 जुलाई 1999 को पाकिस्तानी सेना ने उनकी रेजिमेंट पर हमला बोल दिया। एक बम का गोला कालूराम के पैर पर आकर लगा और उनका पैर शरीर से अलग ही हो गया था। इसके बावजूद भी कालूराम दुश्मनों से लड़ते रहे और अपने रॉकेट लांचर से दुश्मनों का एक बंकर ध्वस्त कर उसमें छिपे 8 घुसपैठियों को मार गिराया।

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जिस दिन शहीद, उसी दिन लिखा मां के नाम खत
कालूराम जाखड़ जिस दिन शहीद हुए थे, उसी दिन सुबह उन्होंने अपनी मां को एक चि_ी भेजी थी। उन्होंने लिखा था कि मां तुम मेरी चिंता मत करना। तेरे बेटे के नाम का शिलालेख गांव में लगेगा और तेरे बेटे को एक दिन पूरी दुनिया जानेगी कि कैसे वह दुश्मनों से लड़ा था। कालूराम का यह पत्र उनके जीवन का आखरी खत बनकर रह गया।

शिलालेख के साथ मूर्ति भी लगी
शहीद कालूराम की शहादत को अमर करने के लिए गांव के लोगों ने भी हरसंभव सहयोग किया। गांव के बीच स्थित सरकारी विद्यालय के पास उनका अंतिम संस्कार किया गया। जहां पर शहीद के परिजनों ने करीब सवा तीन लाख रुपए की लागत से शहीद की आदमकद प्रतिमा स्थापित की। इसके साथ ही राज्य सरकार की ओर से गांव के सरकारी विद्यालय का नाम भी शहीद कालूराम जाखड़ के नाम पर कर दिया। शहीद के आखरी खत के अनुरूप उनके नाम का शिलालेख भी प्रतिमा स्थल पर स्थापित किया गया।

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